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गाँधी या कमांडो ?

इन दिनों आईडिया का एक विज्ञापन टीवी चैनेल्स पर छाया हुआ है। विज्ञापन में एक लड़की होती है जिसे बस स्टैंड पर एक युवक छेड़ रहा होता है। वो अपने मोबाइल फ़ोन से सबसे सुझाव मांगती है... दो ऑप्शन्स होते हैं ... गाँधी या कमांडो ? जनता का मेस्सज आता है, जिनमे निन्यानवें प्रतिशत लोगों का मत होता है कमांडो सिर्फ़ एक प्रतिशत का ही वोट गाँधी को जाता है। उसके बाद लड़की एक किक्क मारती है और इव टीसर चारों खाने चित्त।

विज्ञापन देखकर एक सवाल मेरे मन में उठा की क्या इस तरह से महात्मा गांधी की तुलना करना और फ़िर उन्हें हारते हुए दिखाना उचित है? मैं यही सवाल आप सभी से करती हूँ ... क्या ये उचित है?
जिसने भी इस विज्ञापन की स्क्रिप्टिंग की हो अगर वो अपनी स्क्रिप्ट में थोड़ा सा फेर बदल कर लिया होता और गाँधी की जगह गांधीगिरी कर देता तो शायद उसका अर्थ थोड़ा अलग हो जाता...या फ़िर ये हो सकता है की मैं इसे लेकर कुछ ज़्यादा सोंच गई, पर ये सच है की हाँ मुझे ये अच्छा नहीं लगा।

Comments

मैं आपके साथ हूं। यह विज्ञापन मुझे भी नहीं भाया। इसकी शिकायत किससे करें, यदि पता मालूम हो तो लिखा-पढी करें।
'धन पिशाचों' का एक ही लक्ष्‍य है - पैसा। सो, गांधी उनके लिए 'विचार' नहीं, 'सेलेबल आईटम' है।
आप बिलकुल ठीक कह रही हैं।
sanjaygrover said…
वो अपनी स्क्रिप्ट में थोड़ा सा फेर बदल कर लिया होता और गाँधी की जगह गांधीगिरी कर देता तो शायद उसका अर्थ थोड़ा अलग हो जाता...
Aapka sujhav achchha hai. par nishchint rahiye is vigyapan se Gandhi ji par koi fark nahiN padne wala. jab hatyaare ki goli unka kuchh nahin bigaag saki to in tuchhe-muchhe vigyapanoN se kya hona hai.!
सहमत हू आपसे.....महा शिव रात्रि की बहुत बधाई एवं शुभकामनाऐं..
hum tum said…
i really hate this add...mere man ki bat likhne ke lie badhai
Bandmru said…
सहमत हू आपसे.....
मीत said…
तुम्हारी सोच जायज है प्रिया वो जमाना और था आज का जमाना और है, पहले एक अकेली औरत जिसके तन पर ढेरों गहने सजे हों, रात के बारह बजे भी कहीं भी अकेली जा सकती थी... तब अगर उसे कोई लुटेरा भी मिलता तो उसके गहने लेकर इज्ज़त से उसे छोड़ देता था...पर आज इस दुनिया में हैवानो की संख्या ज्यादा बढ़ गई है... बस इसीलिए गाँधीगिरी की जगह कमांडो....
मीत

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