Wednesday, September 30, 2009

हमारे घर भी गिल्लू...




दिल्ली का घर... बिल्कुल छोटा सा... तीन कमरे का फ्लैट । कहते हैं की दिल्ली के फ्लेट्स में अगर सूरज की रोशनी पहुँच जाए तो ये बड़े सौभाग्य की बात है। कुछ ऐसा ही सौभाग्य हमें प्राप्त है। जी हाँ वैसे तो हम तीन कमरे और एक बड़े से हॉल वाले फ्लैट में रहते हैं ...लेकिन वास्तव में छोटे से क्षेत्र में ही ये चारो कमरे, रसोईघर सिमटा पड़ा है। बेडरूम से सटे एक छोटी सी बालकनी भी है जहाँ जाकर ये अहसास होता है की फ्लैट बनाने वाले ने कितना दिमाग लगाया होगा हर छोटे बड़े कोने का इस्तेमाल करने में। कहाँ हमारे आरा का घर जहाँ बालकनी में हमलोगों ने कितनी बार छुआ छुई खेली, यही नही मैंने तो वहां ढेर सारे गमले लगा रखे थे। गर्मी के दिनों में हम सब भाई बहन बालकनी में आराम से सकते थे इतनी जगह वहां थी। यहाँ... दिल्ली के घर में अगर तीन लोग खड़े हो जाएँ तो ऐसा लगता है की कितनी भीड़ हो गई ... अब चौथे के लिए जगह ही नही है।
खैर... इन सब के बावजूद हम ख़ुद को बेहद सौभाग्यशाली मानते है क्योंकि ये घर काफ़ी खुला हुआ सा है। दिन चढ़ते ही सूरज की रोशनी से हमारी नींद खुलती है। दूसरा कमरा, वो भी बालकनी से ही सटा है, बहुत से जीवों की शरनस्थलि बना हुआ है। उस कमरे में अलमारी के ऊपर कबूतरों ने अपना घोसला बना रखा है और खिड़की पर एक प्यारी सी गिलहरी (जिसे हम गिल्लू कह सकते हैं ) का घर है। खिड़की पर घर होने के बावजूद गिल्लू सारे घर में दौड़ती रहती है। हाँ ...ये गिल्लू, महादेवी वर्मा की गिल्लू से थोडी अलग है। महादेवी वर्मा की गिल्लू के बारे में जब मैं स्कूल में थी तब पढ़ी थी... दिल को छो जाने वाली कहानी। पर मेरी गिल्लू॥बड़ी ही नटखट है... हमेशा शैतानी करती रहती है । जब मैंने पहली बार उसे देखा तो मेरी इच्छा हुई की मैं उसकी हरकतें देखू ... कभी कबूतरों से लड़ाई , तो कभी खिड़की से किचन में आकर खाने की चीजें गिरा देना... कभी हममें से किसी को सोते हुए में ही पैरों की उँगलियों को कुतर कर जगा देना... दिन भर उसका यही काम होता है। आज सुबह ही कबूतर और गिल्लू में लड़ाई हो गयी। गिल्लू उसके घोसले में पहुँच गई और चादर के निचे छिप गई , कबूतर अपने चोंच से उसे मार रहा था और गिल्लू बार बार छिप जा रही थी। मैं उनकी लड़ाई को देखकर मजा लूट रही थी। ये शायद पहली ऐसी लड़ाई थी जिसे देखकर मुझे बहुत मजा आ रहा था।

Saturday, September 5, 2009

शिक्षक दिवस पर मिली अच्छी सीख

सुबह १० बजे ऑफिस के लिए निकली... देर हो चुकी थी....सामने भीड़ से भरी हुई लो फ्लोर बस दिखी । दिल्ली में तीन साल बिताने के बाद अब मुझे आदत हो चुकी है भीड़ वाली बसों में चढ़ने की .... आगे खड़े होने के बाद भी किसी भी अजनबी या यूँ कहें सहयात्रियों से कह कर पैसे पास करने की और फ़िर कही भी खड़े या बैठ कर भी टीकट लेने की ... जी हाँ हर परिस्थितियों में सफर करने की आदत हो चुकी है। आसानी से... बगैर किसी जान पहचान के अपना बोझा दूसरे के गोद में डाल देना यहाँ के लोगों की खासियत है। लेकिन आज जो कुछ भी हुआ उसने हर अजनबियों पर विश्वास ना करने की सीख ज़रूर दे दी।
बस में काफ़ी भीड़ थी... मैं आगे महिलाओं वाली सीट के पास जाकर खड़ी हो गई। पर्स से पैसे निकाल कर टिकट के लिए आगे एक सज्जन को पास कर दी ... उन्होंने भीड़ में ही आगे एक दूसरे बन्दे को, जो कंडक्टर के करीब खड़ा था, पैसे पास कर दिया । पाँच मिनट गुज़र गए ... दस मिनट ...दो स्टाप भी आया और चला गया । मैंने उन सज्जन से पूछा- क्या हुआ? उन्हें ख़ुद नही पता था ... फ़िर उन्होंने इधर - उधर देखा और पता चला की जिसे उन्होंने पैसे दिए थे वो बन्दा ही गायब है यानी किसी स्टाप पर वो पैसे के साथ उतर गया। मुझे समझ नही आ रहा था की मैं क्या करुँ। तभी वो सज्जन जिन्हें मैंने पैसा दिया था अपने पॉकेट से पैसे निकाल कर टिकट के लिए दे दिए .... मेरे लाख मना करने पर भी वे नही माने ... मै उन्हें पैसे देती रही पर वे नही लिए। मैंने उनसे ये भी कहा की लॉस तो मेरा होना था फ़िर आप क्यों अपने पॉकेट से दे रहे हैं ... पर वो नही माने।
उसके बाद तो बस में इसी घटना की चर्चा होती रही। बाद में आने वाले जितने यात्री थे वे किसी को भी पैसा पास कर रहे थे ...वो लेने से इनकार कर दे रहा था ... सभी सबको सलाह दे रहे थे की अपना टिकट ख़ुद लो ।
चाहे जिस कारन से भी पैसे लेकर वो बन्दा चला गया हो लेकिन उसने वहां मौजूद हर व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति पर से विश्वास उठा दिया... वही वो सज्जन जिन्होंने इस घटना की मौन रूप से नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए अपने पॉकेट से पैसे दे दिए... ये अहसास दिलाते हैं की अच्छाई और सच्चाई इस दुनिया में अभी भी बरक़रार है।

Saturday, July 18, 2009

ये क्या जगह है दोस्तों.....?


दिनांक : १६.०७.०९ स्थान : जी बी रोड समय : शाम के तीन बजे

मैं अपनी टीम के साथ पहुँची । पहले से एक स्वयंसेवी संस्था से बातें हो चुकी थी जिसने उन्हें शूट के लिए तैयार कर लिया था, हालाँकि उन्होने हमसे कैमरा छिपा लेने के लिए कहा था और हमने उनकी बात मान ली थी। गाड़ी हमने वहीं पुलिस चौकी के पास पार्क कर दी और फिर हम चल पड़े कोठा नम्बर पचास में। सीढियों पर एकदम अँधेरा और हम चले जा रहे थे। हर मंज़िल पर महिलाएं भरी पड़ी थी वो भी अजीब से मेकअप और कपडों में सजी - धजी, अब तक जैसा फिल्मों में जैसा देखती आई थी उससे एकदम इतर…बिना किसी चकाचौंध के.… हर तरफ अन्धेरा और बेहद संकरी सी सीढ़ियां। हर मंज़िल से अजीब सी बदबू आ रही थी।  मन में थोडी घबराहट थी ... थोड़ा डर ... पर एक आत्मविश्वास। 
जाने कितने मंजिल पार कर हमलोग सबसे ऊपर वाले मंजिल पर पहुचे। वहां भी कमोबेश वही स्थिति थी। कमरे में सीलन ...बदबू... अँधेरा और ढेर सारी महिलाएं । लेकिन उनसब में एक सामंजस्य था,  उनमें इतनी एकता थी कि अगर उनसे बातें नही होतीं तो मुझे वे सभी एक ही परिवार की लगती। एक साथ हँसना, बोलना , खाना , रहना .... उन्हें देखकर ऐसा नही लग रहा था कि हम किसी वैसी जगह आ गए हैं जहाँ आम तौर पर परिवार या लड़कियां या महिलाएं नही आ सकती। सबसे सुखद लगा उन्हें  मातृत्व पालन करते देखना।  वे अपने बच्चों  के साथ खेल रहीं थीं, उनसे तोतली भाषा में बातें कर रहीं थीं।  धीरे - धीरे उनसे बातें शुरू हुई।  शुरू में वे कुछ भी बोलने से हिचकिचा रहीं थीं,  खुल के वे तब बोली जब स्वयंसेवी संस्था के सदस्य जा चुके थे। मैं जानना चाहती थी कि आख़िर एक औरत के तौर पर ऐसी ज़िंदगी उन्होनें क्यों चुनी, उन्हें हर रोज़ कैसी परेशानियों से दो चार होना पड़ता है …  लेकिन कहीं एक हिचकिचाहट थी कि कहीं मेरी बातों से उनकी भावनाएं आहत ना हो जाएँ ।
मैंने उनमें से एक को बुलाया और बातें शुरू की " आप यहाँ कैसे आ गई ? "
" बस आ गई मजबूरी थी । " उसका जवाब था। 
" क्या मजबूरी थी?" मैंने पूछा
" घर की मजबूरी थी, अपना, अपने बच्चों का , परिवार का पेट पालना था । "
"क्या घर पर सभी जानते है?"
"नही मैडम घर पर तो कोई नही जानता सब ये जानते हैं की मैं दिल्ली में रहती हूँ .... नौकरी करती हूँ । कहाँ रहती हूँ ... और क्या करती हूँ ... ये कोई भी नही जानता।"

मैंने दूसरी को बुलाया उम्र यही कोई पैंतालिस के पास की होगी। पहला सवाल वही था "कैसे आना हुआ ?"
"मजबूरी"
"कैसी ?"
" घर में ससुर नही पति नही सिर्फ़ बच्चे और सास। तो रोज़ी रोटी के लिए किसी ना किसी को तो बाहर निकलना ही होता । "
"अब "
" अब तो बहुत बीमार रहते है। बच्चेदानी ख़राब हो गया है। सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए गए , डाक्टर का कहना है की खून चाहिए वो भी परिवार के किसी सदस्य का। अब कहाँ से लायें खून । "
" क्या परिवार में वापस जाने का मन नही करता ?"
" परिवार वाले अब हमको अपनाएंगे नही न। वैसे भी जब जिंदगी भर यहाँ कमाए खाए तो अब क्यों जाए वापस वहां। "
मैं निरुत्तर हो गई ... फ़िर मैंने पूछा "क्या एन जी ओ से इलाज के लिए कोई सहायता मिलती है।"
" नही मैडम वो लोग तो सिर्फ़ कागज़ पर ही काम दिखाते हैं ।"

मैंने एक और महिला को बुलाया जिसकी उम्र पचास के करीब होगी।
" आपको कोई परेशानी है। "
" मैडम जब तक जवान थे तब तक बहुत भीड़ हुआ करती थी । पैसा का कोई कमी नही था। लेकिन अब कोई पूछने वाला नही है। अब तो ऐसा होता है कि नीचे से ही दलाल ग्राहकों को भड़काकर, डरा- धमका कर दूसरी जगह ले जाते हैं । बस गुजर बसर ऐसे ही चल रहा है। आए दिन यहाँ किसी ना किसी की हत्या हो जाती है या फ़िर किसी औरत के चेहरे पर ब्लेड मार दिया जाता है । "

मैंने उनसब की बातें सुनी पर बहुत अफ़सोस हुआ कि मैं उनके लिए कुछ नही कर सकती और जो सवयंसेवी संस्था सरकार से उनके लिए काम करने के नाम पर धन उगाही करती हैं उनका भी नाममात्र हीं उन तक पहुँच पाता है।  उनमें से बहुतों के बच्चें हैं जिनकी पढ़ाई लिखाई .....परवरिश , उस इज्ज़त से नही हो पाती जिसके वो हक़दार हैं। सच में आख़िर उन बच्चों की क्या गलती है ....?  यही सब सोचती रही, सच में इससे पहले सिर्फ फिल्मों में ही इन्हें देखी थी और उसमें तो इनकी ज़िंदगी बेहद रंगीन और  तड़क भड़क से भरपूर दिखाई जाती रही है लेकिन यथार्थ उससे  बिलकुल इतर था।  








Saturday, May 23, 2009

यादें भूल जाती हैं, बातें याद आती हैं...

बहुत दिनों से कुछ लिख नही पाई । कारण बहुत से है ... पर सबसे आसान जवाब है समय की कमी। व्यस्तता थोडी बढ़ गई थी । ऑफिस में काम से फुर्सत नही मिलता था ... घर पर थकावट कुछ लिखने नही देती थी। आज सारे काम निपट चुके हैं , कार्यक्रम का आउट चल रहा है। सोचा लगे हाथ क्यों ना कुछ लिख डालु। शनिवार की शाम यानी अभी ऑफिस के ज्यादातर लोग जा चुके है सिर्फ़ जिनका काम है या फ़िर लाइव वाले लोग रुके हुए हैं । मैं अपने काम से परेशान हूँ एपिसोड अभी तक आउट नही हो सका है । दो बार आउट लगा चुकी , कुछ ना कुछ प्रॉब्लम हो रहा है। इन्ही सब उलझनों में फंसी मैं... जाने कब अपनी सोच में उलझ गई पता ही नही चला।

छोटी ... मेरी सबसे अच्छी दोस्त ... जो कभी मेरे सबसे करीब थी । मेरी बहुत सी बातें जो सिर्फ़ वो जानती थी और उसकी बहुत सी बातें शायद सिर्फ़ मैं जानती थी। आज मुझसे कितनी दूर ... या शायद आज हमदोनो अजनबी बन चुके हैं। उसने ग्रीटिंग्स में लिखा था की जब मैं समय को पकड़ लूंगी तब हमदोनो साथ होंगे। आज न जाने कितने साल गुज़र चुके हैं ... हमदोनों की मुलाक़ात नहीं हुई। घर पर रहने के बावजूद ना वो मुझसे मिलने आई ना मुझे कुछ ख़ास इक्षा हुई उससे मिलने की। आज उसकी शादी हो चुकी है... अपने वैवाहिक जीवन में वो व्यस्त है और मैं अपनी नौकरी में उलझी हुई हूँ। बहुत सी खट्टी मीठी यादें हैं ... हमारी और उसकी जो मैं कभी नहीं भूल सकती। मैं जब भी परेशान होती थी कभी अपनों से गुस्सा होती थी तो उसी के पास जाकर अपना भडास निकालती थी।
यार छोटी आज मैं बिल्कुल अकेली हूँ। अब तो मैं डायरी भी नहीं लिखती... तेरी याद आती है । कभी कभी तो बहुत ज्यादा .... मुझे नहीं पता क्यों ...तू इतनी दूर हो गई... फ़िर भी क्यों पता नहीं क्यों ।

Monday, April 20, 2009

ग़रीबी का मज़ाक

'स्लम डॉग मिलिनेअर' फ़िल्म में काम कर के प्रसिद्धि पा चुकी रुबीना अचानक से कल फ़िर टीवी चैनेल्स पर छाई हुई थी ... कारण बताने की ज़रूरत नही... जिसने भी चैनेल्स को देखा होगा या आज सुबह का अखबार पढ़ा होगा उसे पता होगा। उस नन्ही सी कलाकार के माता पिता पर अपनी बेटी को बेचने का आरोप लगा है। किसी ने भी ख़बर के तह में जाने की कोशिश नही की। रुबीना के फोटो को भी खुलेआम दिखाया गया कुछ चैनेल के पास तो उसके शॉट्स भी आ गए थे... और ज़्यादा स्तरीय बनाने के लिए उसके पिता को लाइन अप कर के उनसे सवाल जवाब शुरू कर दिया ...किसी ने ये सोचने की ज़हमत नही उठाई की ऐसा करने से उस लड़की और उसके पिता की क्या हालत होगी । एक बात मेरी समझ में नही आई की जब अनजानी लड़कियों के खरीद फरोख्त की खबरें अगर हम दिखातें है या उनके बारे में लिखते हैं तो उसके नाम की जगह काल्पनिक नाम लिखते है चेहरा मोजेक कर के दिखातें है फ़िर रुबीना के साथ ऐसा क्यों नही हुआ। जो पत्रकार वहां स्टिंग करने पहुचे थे उनका चेहरा तो ढका हुआ था और वही इस लड़की का और इसके पिता का चेहरा खुला हुआ था। इससे तो ये ही लग रहा था की ये सब कुछ इन्टेंशनाली किया गया था । भारत में फैली ग़रीबी का मज़ाक उडाने के लिए किया गया था... और इस काम में यहाँ की मीडिया नें भी ऐसे लोगों का भरपूर साथ दिया।

Sunday, April 12, 2009

... एक युग का अंत

प्रख्यात साहित्यकार विष्णु प्रभाकर जी अब हमारे बीच नही रहे... दुखद समाचार । 12 दिसम्बर २००८ को मैं अपनी पुरी टीम के साथ उनके घर पर थी ... एक नए कार्यक्रम की शुरुआत के लिए उनका प्रोफाइल शूट करना था। प्रभाकर जी बिस्तर पर लेटे हुए थे। उनसे जब बातें शुरू हुई तो अहसास हुआ कि उन्हें चल फ़िर नही पाने का कितना दुःख है। उन्होंने लेटे हुए ही हमसे बातें की.... उन्होंने कहा - "अब मैं ज़्यादा बोलने की स्थिति में तो हूँ नही, लेकिन आप लोग जो पूछेंगे वो मैं बताऊंगा ..... ।" जब उनसे उनकी श्रेष्ठ कृतियों में से एक 'आवारा मसीहा' के बारे में पूछा गया तो पहले तो वे उसे याद नहीं कर पाये, फ़िर जब उन्हें याद दिलाया गया तो वे बोल पड़े - '"शरत चंद्र को मैंने बहुत करीब से जानने की कोशिश की तो पाया की उन्हें हमेशा ग़लत समझा गया था।"
मै कभी नही सोची थी की कभी मैं उनसे मिल सकूंगी, बातें कर सकूंगी। वो दिन मेरी जिंदगी के कुछ अविस्मरणीय पलों में से एक था। प्रभाकर जी इससे भी दुखी थे कि जब से वे बिस्तर पर पड़े हैं उनसे मुलाक़ात करने वालों की संख्या कम हो गई है। हमेशा व्यस्त रहने वाले विष्णु जी जब अस्वस्थ हुए तो बिस्तर पर सारा दिन गुजारने पर कभी कभी झुंझला उठते थे और कहते थे ' मुझे अब और जिंदा नहीं रहना' ।
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Tuesday, March 17, 2009

बीत गयी होली

होली बीत गयी। घर गई थी वापस आ गई, वो भी बड़े ही बेमन से। छुट्टी से वापस आने के बाद अक्सर ये महसूस होता है कि ये छुट्टियाँ इतनी छोटी क्यों होती हैं। जो नहीं होता उसकी चाहत होती है और जो होता है वो हमेशा कम क्यों लगता है? आरा से आते समय ट्रेन में काफ़ी भीड़ थी। सभी हमारी तरह अपने अपने घरों से होली मना कर अपने अपने कार्यक्षेत्र को लौट रहे थे, या दूसरे शब्दों में सभी प्रवासी दिल्ली वापस लौट रहे थे । भीड़ इतनी ज़्यादा कि अरक्षित सीट वाले भी बेचारे सिकुडे से बैठे थे, और जिनका टिकट कन्फर्म नही हुआ था वे टी टी के आगे पीछे भाग रहे थे और टी टी, हाँ , ऐसे समय में तो इनकी लौटरी ही खुल जाती है। वो आगे आगे और लोग उनके पीछे -पीछे... कभी लोगों को समझाते हुए तो कभी उन्हें झिड़कते हुए " अगर इतना लंबा सफर और ऐसे समय में करना था तो रिजर्वेशन पहले से क्यों नहीं लिया, "। बेचारे लोग सारी बातों को सुनकर भी उसके पीछे लगे थे की शायद उनपर तरस खाकर इतना सब सुनने के बाद उन्हें एक सीट मिल ही जाए।
वे लोग जिनके पास बर्थ नही था उनके पास तीन ऑप्शन्स थे (... और होंगे तो मुझे नही पता ) पहला की वो बर्थ के निचे अखबार बिछा कर अपनी सीट बना ले, दूसरा की वे बाथरूम के बगल वाली खाली जगह पर अपना कब्ज़ा जमा लें या फ़िर तीसरा की बैठे बैठे ही उन्घकर अपनी नींद पुरी कर लें।
इनलोगों की भीड़ को देखकर मैं ख़ुद को भाग्यशाली समझ रही थी की कम से कम हमारे पास तीन सीट्स तो हैं .

Saturday, February 28, 2009

भीख मांगने की मजबूरी


दिल्ली में जहाँ देखो एक चीज़ बड़ी ही कोमोन नज़र आती है वो है हर गली, नुक्कड़, चौक-चौराहों, रेड लाइट्स पर भीख मांगने वालों की अच्छी खासी तादाद। अगर मंगलवार हो तो हनुमान मन्दिर, गुरुवार हो तो साईं मन्दिर, शुक्रवार हो तो मस्जिद और शनिवार को शनि मन्दिर के आस पास भीख मांगने वालों से मुलाक़ात हो ही जाती है। कहीं शारीरिक विकलांगता भीख मांगने पर मजबूर करती है तो कहीं अच्छा भला आदमी भीख के लिए ख़ुद के विकलांग होने का ढोंग रचता है। ये मैं यू ही नहीं लिख रही हूँ... मैंने अपनी आंखों से देखा है।

अक्सर ऑफिस जाने के लिए मुझे जनपथ से होकर जाना पड़ता है। वहां एक हाथ वाली , कद काठी से अच्छी भली लड़की भीख मांगती अक्सर नज़र आ जाएगी। बहुत सारे लोगों ने अक्सर उसपर तरस खाकर उसे पैसे भी दिए होंगे, क्योंकि एक बार ये गलती मैं भी कर चुकी हूँ। हाल ही में मैं बस से उस रास्ते से गुज़र रही थी तो देखा उसने अपने गंदे और ढीले से समीज में अपने दूसरे हाथ को छिपाए लोगों से एक हाथ से भीख मांग रही थी। जैसे ही लाल बत्ती खुली वो फ़िर से अपने दोस्तों के साथ मिलकर दोनों हाथों से समोसे खाने लगी। मुझे ये देखकर बेहद अफ़सोस हुआ, साथ ही ऐसे लोगों को देखकर मन क्षुब्ध हो गया। सोंचने लगी उस लड़की की कमअक्ली पर, साथ ही समाज की इस व्यवस्था पर... जहाँ एक अच्छे भले आदमी को विकलांग बनने की एक्टिंग करनी पड़ती है, और वो भी पुरे समाज के सामने।

Monday, February 23, 2009

गाँधी या कमांडो ?

इन दिनों आईडिया का एक विज्ञापन टीवी चैनेल्स पर छाया हुआ है। विज्ञापन में एक लड़की होती है जिसे बस स्टैंड पर एक युवक छेड़ रहा होता है। वो अपने मोबाइल फ़ोन से सबसे सुझाव मांगती है... दो ऑप्शन्स होते हैं ... गाँधी या कमांडो ? जनता का मेस्सज आता है, जिनमे निन्यानवें प्रतिशत लोगों का मत होता है कमांडो सिर्फ़ एक प्रतिशत का ही वोट गाँधी को जाता है। उसके बाद लड़की एक किक्क मारती है और इव टीसर चारों खाने चित्त।

विज्ञापन देखकर एक सवाल मेरे मन में उठा की क्या इस तरह से महात्मा गांधी की तुलना करना और फ़िर उन्हें हारते हुए दिखाना उचित है? मैं यही सवाल आप सभी से करती हूँ ... क्या ये उचित है?
जिसने भी इस विज्ञापन की स्क्रिप्टिंग की हो अगर वो अपनी स्क्रिप्ट में थोड़ा सा फेर बदल कर लिया होता और गाँधी की जगह गांधीगिरी कर देता तो शायद उसका अर्थ थोड़ा अलग हो जाता...या फ़िर ये हो सकता है की मैं इसे लेकर कुछ ज़्यादा सोंच गई, पर ये सच है की हाँ मुझे ये अच्छा नहीं लगा।

Saturday, February 14, 2009

प्रेम पर्व और प्रिये तुम



प्रेम.... प्यार ... इश्क.... मोहब्बत... कितने अच्छे शब्द हैं । किसी ज़माने में प्रेम में पड़े लोगों के लिए इनका गहरा मतलब हुआ करता था। एक प्यार से भरा दिल अपनी चाहत का इज़हार अक्सर पत्रों के माध्यम से किया करता था। फ़िर वो पत्र या तो 'मुग़ल ऐ आज़म ' फ़िल्म की तरह कमल के फूल की पंखुरियों में छिपा कर बहते जल के मध्यम से प्रियतमा तक पहुँचाया जाता था, या फ़िर किताबों में रख कर या फ़िर 'मैंने प्यार किया' फ़िल्म की तरह कबूतर बनता था संदेशवाहक। कितना रोमांटिक हुआ करता होगा तब प्रेम पत्र, जिसे पढ़ते ही नायिका चाहे ना चाहे इजहारे मोहब्बत को तुंरत स्वीकार कर लेती थी। आज दुनिया हाईटेक हो गई है, नायक नायिका बिंदास हो गए हैं। आज मिले...कल प्यार हुआ.... परसों शादी... और फ़िर तलाक, मामला ख़त्म और फ़िर नई कहानी शुरू । हाथ में मोबाइल है ...घर में कंप्यूटर। जब मन किया एस एम् एस कर दिया या फ़िर बहुत दिल से इज़हार करना है तो प्रेम पर्व तो है ही.... साथ ही है हाई टेक ग्रीटिंग्स, बस एक क्लिक करने भर की देरी है।


"वैलेंटाइन डे " यानी नए ज़माने का प्रेम पर्व। यानी अपने जज़्बात को बताने का एक और मौका... हर प्यार करने वाले एक दूसरे को उपहार ज़रूर देते हैं फ़िर चाहे एक गुलाब का फुल ही क्यों ना हो । यहाँ एक बात और बताना चाहूंगी की इस दिन गुलाब के एक फूल की कीमत भी बहुत ज़्यादा होती है। आज नायिका घर की चाहरदीवारी के अन्दर क़ैद नही है... ना ही उसके पैरों में लज्जा का बंधन है। आज वो चूजी हो गई है... वो अपनी पसंद नापसंद का इज़हार कर सकती है। आज वो ज़्यादा उन्मुक्त है, वो ख़ुद भी कमाती है , इसलिए उसे पता है की किस गिफ्ट की कीमत क्या है । वो , उसे प्रोपोस करने वाले के स्तर का पता उसके उपहार की कीमत से लगा लेती है। आज नायिका नायक का इंतज़ार नहीं करती उसके पास बहुत ऑप्शन्स हैं। जी हाँ ये आज के "प्रेम पर्व" और उसे सेलिब्रेट करते युवा वर्ग और किशोरों की कहानी है जो अपने गर्ल फ्रेंड को रिझाने के लिए बेतहाशा खर्च करने से भी गुरेज नही करते और गर्ल फ्रेंड्स इमोशंस से ज़्यादा गिफ्ट की कीमत पर मर मिटती हैं।

Wednesday, February 4, 2009

... समय के साथ बदल रही है गाँधी जी की सीख




एक समय था जब गाँधी जी के बंदरों की कहानी जूनियर स्कूल की किताबों में हुआ करती थी। बचपन में ही गाँधी जी के बंदरों का महत्व बताया जाता था। एक बन्दर जो अपनी आँखें बंद किया है उसका अर्थ है बुरा मत देखो , दूसरा जो मुंह बंद किया है उसका मतलब है बुरा मत बोलो और तीसरा जो कान बंद किया है उसका अर्थ है बुरा मत सुनों। वक्त बदला ... समाज बदला और आज के सन्दर्भ में उसका अर्थ भी बदल गया है। आज पहले बन्दर का अर्थ है कुछ भी ग़लत होता रहे आँखें बंद रखो, दूसरे का मतलब है चाहे तुम जानते हो की ये सही है और ये ग़लत दूसरों को कभी सलाह मत दो, और जिसने कान बंद किया है उसका मतलब है तुम्हारे सामने कुछ भी ग़लत हो अपने कान बंद रखो ताकि दूसरों की परेशानिओं से तुम्हे परेशानी ना हो। समय के साथ सीख भी बदल गई।

लेकिन अफ़सोस तब हुआ जब मेरे एक बहुत ही पसंदीदा ब्लॉग में महात्मा गाँधी के चौथे बन्दर की कहानी को छापा गया। ऐसा लगा जैसे गाँधी जी की शिक्षा या फ़िर उनकी बातों का मजाक बनाया जा रहा है। मुझे काफ़ी अफ़सोस हुआ और शायद हर उस बन्दे को अफ़सोस हो जो महात्मा गाँधी का सम्मान करता हो।


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...जो छुट गया वह कहाँ मिले.



सरस्वती पूजा के साथ ही शुरू हो जाता है पावन बसंत। बचपन से ही मुझे बसंत का मौसम बेहद पसंद है । इस मौसम में न तो ज़्यादा ठण्ड होती है और न ही गर्मी । आम के पेड़ों पर मंजर आ जाता है ,
ज्यादातर फूलों के खिलने का मौसम भी यही होता है।

बसंत बह त्रिविध , सब कहे सुलभ पदारथ चारी। '

एक समय था जब हमारे आरा के घर के बागीचे में बड़े वाले नीबूं, जिसे उधर की भाषा में घाघर बोलते हैं, का पेड़ हुआ करता था । इस मौसम में ही उसमे फूल लगते हैं। जब हम अपने कमरे की खिड़कियाँ खोलते थे। उसकी खुशबू से सारा कमरा भर जाता था। वो ऐसी खुशबू थी जिसे नहीं भूल पाई हूँ मैं आज तक। ऐसा लगता था की किसी रूहानी दुनिया का सुख मिल गया हो । शायद यही कारन रहा हो... यही वो अनुभव रहा हो जिससे प्यार का पर्व भी इसी मौसम में आता है। प्यार भी तो वही अहसास है जो रूह से रूह तक जाता है।

बसंत के बाद ही फागुन का महिना होता है । गांवों में तो बसंत के बाद ही होली की शुरुआत हो जाती है। ' साहब सेवक एक संग, खेले सदा बसंत '।

जगह जगह फगुआ गाना शुरू कर देती है टोली। हालांकि मुझे ख़ास देहात के फगुआ का मजा तो कभी नहीं मिला लेकिन लोगों से सुनकर उसके आनंद को मैंने महसूस किया है। जैसे मौसम में मुझे बसंत प्रिये है वैसे ही त्यौहारओं में होली जाने क्यों मुझे बेहद पसंद है। होली की मस्ती ... होली का हंगामा दिल में एक हलचल मचा देता है। रंग लगवाने को लेकर पहले ना ...ना ...ना, फ़िर हाँ ...हाँ उफ़ बचपन की मस्ती की बात ही कुछ और थी । उसकी ही यादें है जो आज भी मुझे ये सबकुछ बेहद पसंद है। लेकिन हाँ वो निश्चिन्तता... वो अल्हरपन ... वो समय अब ना रहा ... वो हम ना रहे।

...लेकिन शर्म उनको आती नहीं.




मुझे शिकायत है उनलोगों से जो बसों में आम तौर पर वरिष्ठ नागरिक की सीट पर कब्ज़ा जमा कर बैठ जाते हैं और बुजुर्ग खड़े होकर यात्रा करने पर मजबूर होते हैं। अगर कभी अपने वरिष्ठ होने की बात कहकर वे उन्हें उठाने की कोशिश करते हैं तो ये लोग बेशर्मों की तरह हंस कर अपनी नज़रें चुरा लेते हैं और बुजुर्ग खड़े रह जाते हैं। मुझे शिकायत है उन नौजवानों से भी जो बसों में, भीड़ में लड़कियों और महिलाओं को छूने के बहाने खोजते हैं।अगर कोई महिला या लड़की उन्हें इसके लिए रोकने का हिम्मत जुटाती है तो वे बडे ही बेशर्मी से उनसे लड़ बैठते हैं। मुझे शिकायत उनसे भी है जो धुम्रपान निषेध की वैधानिक चेतावनी के बावजूद सार्वजनिक जगहों पर सिगरेट पिते हैं और अपने साथ साथ औरों की भी बीमारी की वजह बनते हैं।
शिकायतें तो बहुत हैं....लेकिन ये कुछ ऐसी समस्याएं है जिनसे हम लडकियां रोज ही दो चार होते हैं । पर सवाल ये उठता है की आखिर किस किस का और कहाँ कहाँ विरोध करें? कभी मुंबई, कभी डेल्ही, कभी मंगलूर तो कभी कानपुर में नैतिकता के बहाने समाज के ठेकेदार जब अपनी ठेकेदारी पर उतरते हैं तब क्या उन्हें ये सब नज़र नहीं आता या, वे भी उनमें से ही एक हैं जो लड़कियों को छूने के बहाने खोजते हैं ?
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Tuesday, January 13, 2009

आज और कल


देखते ही देखते
सरक गया
एक और पल
और आज बन गया कल।
नव वर्ष की सभी को बहुत बहुत बधाई।