Monday, October 27, 2008

वेल बिहाव्ड वूमेन ररली मेक हिस्ट्री





लक्ष्मीनगर से पार्लियामेन्ट तक आना और वो भी ऑफिस टाइम यानी सुबह ९ बजे से एग्यारह बजे के बिच, कोई आसान काम नही है । ट्रैफिक की बाढ़ होती है... ऐसा लगता है की जाने कहाँ बहा ले जायेगी। उस समय कोई भी निकलना नही चाहता, यहाँ तक की ऑटो वाले भी ऑफिस का नाम लेने पर कन्नी कटाने लगते हैं। शुक्रवार को मै ऑफिस जा रहीथी।आई टी ओ पर ट्रैफिक करीब पन्द्रह मीनट से रुकी हुई थी । ऐसे बोरियत भरे समय में ध्यान इधर उधर भटकता रहता है। मैं भी सामने खड़ी हर गाड़ी को देख रही थी उसपर लिखे कैप्शंस को पढ़ रही थी। एक पञ्च लाइन ने मेरा ध्यान अपनी और खिंचा और मेरे अन्दर उस गाड़ी के मालिक को देखने की इच्छा हुई। लाइन इंग्लिश में था "वेल बिहाव्ड वूमेन ररली मेक हिस्ट्री". पता नहीं क्यों मैं उस पंक्ति को पढने के बाद पुरे रास्ते उसपर सोंचती रही की क्या जो लिखा है वो सच है... सही है। मुझे लगा की शायद बिल्कुल सही है। घर से बाहर निकलने के बाद एक लड़की हर काम के लिए संघर्ष करना पड़ता है... लड़ना पड़ता है। अगर वो किसी से भी अच्छे से बात करे तो सामने वाला उसे कमज़ोर समझ या तो उसका फायदा उठाने की कोशिश करता है या फ़िर उसे दबाया जाता है। ऐसे मैं परिस्थिति ही ऐसी हो जाती है जो लड़कियों को लड़ने पर मजबूर कर देती है। हर बार आत्मरक्षा के लिए तैयार महिलाऐं कब वेल बिहाव्ड से ईल बिहाव्ड हो जाती हैं पता ही नहीं चलता।