Monday, June 2, 2008

कम उम्र में शादी और मातृत्व

स्त्री और पुरूष इश्वर की अनुपम रचना हैं। संसार को चलाने के लिए दोनों की ही बराबर की हिस्सेदारी ज़रूरी है। सिंधु सभ्यता की बात हो या फ़िर वेदिक सभ्यता की, स्त्रियों की पूजा इस देश की सभ्यता और संस्कृति में सदियों से निहित है। लेकिन धीरे धीरे जब बाहर से आक्रमणकारियों ने यहाँ धावा बोला स्त्रियों की स्थिति कजोर होती गई। शायद यही वो समय रहा होगा जब से लोग लड़कियों को बोझ मानने लगे होंगे, उनकी सुरक्षा और जिम्मेदारियों से मुक्ति के लिए उनकी जल्दी से जल्दी शादी करने की प्रथा की शुरुआत भी ऐसे ही हुई होगी ।
आज वो प्रथा इस देश के लिए किसी नासूर से कम नहीं। नन्ही उम्र में शादी यानी किसी नन्हें पौधे से फल की अपेक्षा करना, ये मानव की सबसे बड़ी भूल है। अगर कच्ची उम्र में किसी लड़की की शादी की जाती है तो वो लड़की ना ही प्राकृतिक रूप से इसके लिए तैयार होती है ना ही मानसिक रूप से , इसीलिए तो क़ानून में भी लड़कियों के शादी की उम्र अठारह साल तय की गई है। बावजूद इसके आज भी खुले आम बाल विवाह हो रहे हैं, और इसके ख़िलाफ़ कदम उठाने वाला कोई नहीं है। यहाँ तक की राजस्थान में तो एक ख़ास मौके पर सामुहिक बाल विवाह करवाए जाते हैं और वो भी खुलेआम। कच्ची उम्र में शादी की सबसे ज्यादा खामियाजा भुगतना पड़ता है लड़कियों को, क्योंकि वे हर बातों से अनजान होती हैं। उन्हें पता नहीं होता की वे किस बन्धन में बंधने जा रहीं है। उनका शरीर इसके लिए तैयार नहीं होता। किसी भी स्त्री के लिए मातृत्व सबसे खूबसूरत पल होते हैं, लेकिन कच्ची उम्र में वही मातृत्व लड़की के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं। उन्नीस से कम उम्र में माँ बनने वाली मahilaon के डिलिवरी के समय मौत की संभावना बालिग उम्र में माँ बनने वाली से पाँच फीसदी ज्यादा है। भारत में पन्द्रह से उन्नीस साल की चार में से एक लड़की शादीशुदा है। नन्ही उम्र में ब्याही जाने वाली ज्यादातर बच्चियां पति और ससुरालवालों के ज़ुल्म का शिकार होती हैं। ये ज़ुल्म शारीरिक प्रतारना से लेकर मानसिक यातना तक होता है।
कच्ची उम्र में शादी का एक बहुत बड़ा कारन अशिक्षा और गरीबी है। अगर हाल के सर्वेक्षणों पर गौर करें तो पाएंगे की सबसे ज्यादा बाल विवाह राजस्थान में हो रहे हैं। वहाँ पन्द्रह से उन्नीस साल के बीच विवाह के बन्धन में बंधने वाली लड़कियों की संख्या करीब ४१ फीसदी है। आजादी मिलने के बाद से इस देश के haalaat में बहुत बदलाव हैं । कम उम्र में विवाह पर लगाम lagaane की कोशिश भी की गई लेकिन सिलसिला अब भी जारी है। शायद इसके लिए एक गंभीर राजनितिक मंथन की ज़रूरत है या फिर सामाजिक चिंतन की , तभी तो जागरूकता के साथ एक नया आगाज़ होगा और देश तरक्की के नए मुकाम तय करेगा।