Sunday, May 11, 2008

एक मुलाक़ात

एक कार्यक्रम के सिलसिले में मुझे उषा राय से मुलाक़ात करने का मौका मिला। जी हाँ वही उषा राय जिनका नाम उन महिला पत्रकारों में शामिल है जिन लोगों ने साठ के दशक में पत्रकारिता में महिलाओं को एक मुक़म्मल स्थान दिलाने की एक पहल शुरू की थी। उनसे मुलाक़ात के बाद कई ऐसी जानकारियाँ मिली जो हम जैसे नए पत्रकारों के लिए ख़ास था। आज महिला पत्रकारों की जैसी स्थिति है हमेशा से वैसी नही थी। ये उस समय की महिला पत्रकारों के प्रयास का हीं कमाल है की आज महिलाऐं बिना किसी पाबन्दी या मुश्किलात के आसानी से पत्रकारिता कर पा रही हैं। साठ के दशक में महिलाओं को पत्रकार रखा ही नहीं जाता था। उषा जी ने एक और महिला पत्रकार प्रभा दत्त की कहानी बताई की कैसे जब वे एक प्राइवेट अखबार में नौकरी के लिए गयी तो उन्हें सिर्फ़ इसलिए मना कर दिया गया क्योंकि वे एक महिला थी। डेढ़ साल बाद उसी अखबार ने एक महिला को डेस्क पर रखा तब प्रभा जी ने उस अखबार के दफ्तर का दरवाज़ा फ़िर खटखटाया और कहा की जब उस महिला को वहाँ काम मिल सकता है तो उन्हें क्यो नही। अंत में जीत प्रभा जी की ही हुई। यही नही पहले महिला पत्रकारों के लिए मतेर्निटी लीव जैसी कोई सुविधा नही दी जाती थी। इसके लिए भी तब महिला पत्रकारों ने काफ़ी मशक्कत की। तब महिलाओं से या तो डेस्क पर काम लिया जाता था या फिर सॉफ्ट स्टोरी को कवर करने के लिए कहा जाता था।
आज समय बदल गया है, महिलाओं को हर क्षेत्र में भागीदारी मिल रही है। पर आज भी हर बार महिलाओं को पहले ये साबित करना होता है की वे अपने कार्य को लेकर गंभीर हैं, तब जाकर लोग उसे गंभीरता से लेते हैं। हर बार महिलाओं को ये साबित करना होता है की वे सिर्फ़ अपना जॉब करना चाहती हैं। हलाकि क्षेत्रीय स्तर पर आज भी महिला पत्रकारों की स्थिति में ज्यादा का अन्तर नहीं है। आज भी वहाँ महिलाऐं सुब एडिटर से ज्यादा कुछ नही बन पाती। आज भी उन्हें पैसे दिन के हिसाब से मिलते हैं। आज भी उन्हें यही समझा जाता है की वे अगर पत्रकारिता में आई हैं तो सिर्फ़ पति खोजने के लिए। आज भी क्षेत्रीय स्तर पर अखबारओं के बहुत कम ऐसे कार्यालय हैं जहाँ महिला पत्रकारों के लिए अलग से वाश रूम की व्यवस्था हो। लेकिन चाहे कुछ हो पर इतना तो यकीं है की आज नहीं तो कल वहाँ भी महिला पत्रकारों की स्थिति सुधरेगी। चलते चलते जब इतनी दूर निकल आए, तो यकीं है की हम आस्मान भी छू लेंगे।