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Showing posts from January 13, 2008

नवयुगल

घन छाया नभ में अभी अभी
बादल गरजे है बार बार। अब गरज गरज बरसे है घन
धरती भींगी है झूम झूम

तरुणी भाई है ये धरती
वरुण भी हुआ है तरुण अभी ।
हवा के झोंके धरती को
चूम चूम करते हैं प्यार
तब झूम झूम नाचे है
मन का मयूर बार बार। नवयुवती सी ये धरा
रहे खिली खिली

जब पड़े फुहार।
सब कहे इस नवयुगल को
बस प्यार प्यार, बस प्यार प्यार।

आदमी

आदमी,
मंच पर खड़ा होकर
लाखों जनता के सामने कहता है
भारत कि स्त्रियाँ "सीता और सावित्री" हैं
मैं उनका सम्मान करता हूँ।
तालियों कि आवाज़
जनता आदमी कि जयकार करती है।
आदमी,
अन्धकार में "दुह्शासन" बन जाता है।
"सीता और सावित्री"उसे
"द्रोपदी"नज़र आती है ।
द्रोपदी "विलाप करती है
लेकिन आज...
कोई " कृष्ण " नहीं आता
जनता " कौरव " बन जाती है।
और ,
" द्रोपदी " कि चीत्कार
कौरवों के अट्टहास में खो जाती है।


vivekanand

शूद्र कहे जाने की पीड़ा, विवेकानंद की जुबानी
-दिलीप मंडलअद्वैत मत की ध्वजा पश्चिम में लहराने वाले स्वामी विवेकानंद का आज जन्मदिन है। इसलिए विवेकानंद को नए सिरे से पढ़ना शुरू किया- खंड एक, फिर दो, फिर कुछ चिट्ठियां और खंड तीन। खंड तीन में स्वामीजी का मद्रास के विक्टोरिया हॉल में भाषण। विश्व धर्म महासम्मेलन के बाद मद्रास में उनका स्वागत हुआ। भीड़ इतनी थी कि स्वागत समारोह में उनका भाषण नहीं हो पाया। यही भाषण बाद में विक्टोरिया हॉल में दिया गया। पूरा भाषण आप इस साइट पर देख सकते हैं। यहां उस भाषण के एक अंश का अनुवाद प्रस्तुत है। मूल इंग्लिश उसके नीचे पढ़िए। ये अंश इसलिए, क्योंकि ये विवेकानंद की उस बहुचर्चित-ज्ञात छवि से प्रस्थान है, जिसके बारे में सभी जानते हैं। पढ़िए विवेकानंद को :"समाज सुधारकों की पत्रिका में मैंने देखा कि मूझे शूद्र बताया गया है और चुनौती दी गई है कि शूद्र संन्यासी कैसे हो सकता है। इस पर मेरा जवाब है : मैं अपना मूल वहां देखता हूं जिसके चरणों में हर ब्राह्मण ये कहते हुए वंदना करता है और पुष्प अर्पित करता है - यमाय धर्मराजाय चित्रगुप्ताय वै नम:। और जिनके पूर्वपुरुष क्…