Skip to main content

एड्स: जारी है संघर्ष


पिछले दिनों अपने कार्यक्रम के सिलसिले में मैंने एड्स रोगियों से मुलाक़ात की कोशिश की । ये काम इतना आसान भी नहीं था। काफ़ी नेट सर्फिंग के बाद कुछ एनजीओ का पता मिला जो इनलोगों के लिए काम करते हैं। पता लेकर आनन फानन में मैं उनसे मुलाक़ात तय कर मिलने के लिए चली गई। कुछ इंतज़ार के बाद मेरी मुलाक़ात उस आरगेनाइजेशन को चलाने वाले से हो गई। छोटे से परिचय के बाद काम की बात शुरू हुई। मैंने अपने कार्यक्रम के बारे में बताया , ये भी कहा की मुझे एड्स रोगी से मिलना है, उनके परिवारवालों से मुलाक़ात करनी है। इधर उधर की बात के बाद वो सज्जन समझाने लगे की क्या कोई एड्स रोगी कैमरा के सामने आएगा...नहीं। जब कोई भी व्यक्ति एच आई वी पोसिटिवे होता है तो उसके सामने सबसे पहले उसका परिवार आता है... फ़िर ज़िन्दगी जीने की समस्या आती है, फ़िर सवाल उठता है की आख़िर ज़िन्दगी जीने के लिए अहम् चीज़ ....पैसा ,कहाँ से आएगा.....ये सारी समस्याओं को बताने के बाद वे मुझसे पूछे की क्या हमारा चैनल उन्हें पैसे भी देगा? मैंने पैसे देने में अपनी असमर्थता ज़ाहिर की और कहा की हम उनकी समस्याओं को लोगों के सामने लायेंगे, पर इसके लिए उन्हें हमारा साथ देना होगा। इसके बाद वे सज्जन बहुत तरह की बातें करते रहे, फ़िर मुझसे पूछा की अगर मान लो हम साथ में काम कर रहे हैं , हम दोनों के बिच अच्छी दोस्ती भी हो, और तीन चार साल के बाद अचानक तुम्हे पता चले की में एच आई वी पोसिटिव हूँ तुम्हारी क्या प्रतिक्रिया होगी। मुझे पहले तो समझ नहीं आया की क्या जवाब दूँ, सिर्फ़ इतना ही कह सकी की मुझे अफ़सोस होगा।
इसके बाद उन्होंने कहा की वे मेरी मदद करेंगे पर इसके लिए मुझे एक कंसेंट फॉर्म साइन करना पड़ेगा। में ओके कर दी। उसके बाद तय हुआ की जहांगीरपुरी में मेरी मुलाक़ात एच आई वी पोसिटिव महिला से होगी। तय दिन हम निकल पड़े , और पहुँच गए जहांगीरपुरी। उस महिला से मैंने पूछा की आखिर कैसे वे पोसिटिव हो गयीं और उन्हें इसका पता कैसे चला? वे बताई की उन्हें ये बिमारी उनके पति से मिली है और इस बीमारी की ख़बर तब हुई जब उनका पति अक्सर बीमार रहने लगा। जब डॉक्टर ने उसके सारे चेक उप करवाए तब पता चला की उसे ये बीमारी है फ़िर महिला की भी जांच की गई तो उसमे भी ये वाइरस था और उसकी बेटी जो उस वक्त चार या पाँच महीने की थी उसे भी ये बीमारी थी। उसके बाद उस औरत का पति, ये सोचने लगा की उसकी पत्नी के चाल चलन सही नही थे, इसलिए उसे ये बीमारी हुई । इसके लिए अभी भी पति , पत्नी को दोषी मानता है, साथ ही उसे खूब मारता पिटता है ।हलाँकि इस बारे में उनलोगों ने अपने परिवार में किसी को भी नहीं बताया है। ये सिर्फ़ पति -पत्नी को पता है। एनजीओ ने भी उनलोगों को अपनी बिमारी के बारे में किसी से भी कहने से मना कर रखा है। वे महिला बता रही थी की अगर किसी को पता चल जाए की सामने वाला ऐड्स का रोगी है तो उसके साथ बहुत ही बुरा व्यवहार किया जाता है। यहाँ तक की डॉक्टर और नर्स भी उनकों छूने से डरते हैं। उनके लिए काम करने वाले जो एनजीओ हैं उसके कार्यकर्ता भी उस बोत्तल से पानी पीना पसंद नहीं करते जिससे ऐड्स रोगियों ने पानी पिया हो।

Comments

रंजन said…
सही कहा..
बहुत discrimination है..
Udan Tashtari said…
प्रभावी आलेख. एनजीओ के कार्यकर्ता हों या कोई और, पर्याप्त जानकारी के आभाव में यही होगा.
मीत said…
मार्मिक...
ऐसा जानकार बहुत दुःख होता है!
उम्मीद है प्रिया की तुम्हारा लेख पढ़कर लोगो को कुछ समझ आये...
लेख बहुत अच्छा है...
जारी रहे...
Bandmru said…
सही कहा..पर्याप्त जानकारी के आभाव में यही होगा.
उम्मीद है लेख पढ़कर लोगो को कुछ समझ आये...बहुत अच्छा..... प्रभावी आलेख.जारी रहे...
makrand said…
bahut sunder lekh jawalant samasaya pr
i had written in my old post
jo dikhata he vo bikata he
visit my dustbin if possible
regards
makrand said…
bahut sunder lekh jawalant samasaya pr
i had written in my old post
jo dikhata he vo bikata he
visit my dustbin if possible
regards
neelima garg said…
Awareness is a must to prevent the disease....

Popular posts from this blog

हमारे घर भी गिल्लू...

दिल्ली का घर... बिल्कुल छोटा सा... तीन कमरे का फ्लैट । कहते हैं की दिल्ली के फ्लेट्स में अगर सूरज की रोशनी पहुँच जाए तो ये बड़े सौभाग्य की बात है। कुछ ऐसा ही सौभाग्य हमें प्राप्त है। जी हाँ वैसे तो हम तीन कमरे और एक बड़े से हॉल वाले फ्लैट में रहते हैं ...लेकिन वास्तव में छोटे से क्षेत्र में ही ये चारो कमरे, रसोईघर सिमटा पड़ा है। बेडरूम से सटे एक छोटी सी बालकनी भी है जहाँ जाकर ये अहसास होता है की फ्लैट बनाने वाले ने कितना दिमाग लगाया होगा हर छोटे बड़े कोने का इस्तेमाल करने में। कहाँ हमारे आरा का घर जहाँ बालकनी में हमलोगों ने कितनी बार छुआ छुई खेली, यही नही मैंने तो वहां ढेर सारे गमले लगा रखे थे। गर्मी के दिनों में हम सब भाई बहन बालकनी में आराम से सकते थे इतनी जगह वहां थी। यहाँ... दिल्ली के घर में अगर तीन लोग खड़े हो जाएँ तो ऐसा लगता है की कितनी भीड़ हो गई ... अब चौथे के लिए जगह ही नही है।
खैर... इन सब के बावजूद हम ख़ुद को बेहद सौभाग्यशाली मानते है क्योंकि ये घर काफ़ी खुला हुआ सा है। दिन चढ़ते ही सूरज की रोशनी से हमारी नींद खुलती है। दूसरा कमरा, वो भी बालकनी से ही सटा है, बहुत से जीवों की …

सिर्फ विरोध के लिए विरोध या कुछ और ?

बचपन में चित्तौड़गढ़ की रानी पद्मावती और उसके जौहर की कथा खूब सुनी थी। किसी बाल पुस्तक में भी राजा रतन सिंह की बहादुरी के किस्से और पद्मावती के जौहर की कथा पढ़ी थी। लोककथाओं में आज भी उनके किस्से ज़िंदा हैं। फिर उन किस्सों को फिल्म के माध्यम से दिखाए जाने पर इतना बवाल क्यों ? हमें किस पर आपत्ति होनी चाहिए ? क्या आज हम फंतासी और सत्य के बीच काफर्क भूलते जा रहे हैं या फिर हम सब किसी भ्रम अथवा किसी पूर्वाग्रह में जी रहे हैं।     संजय लीला भंसाली ने पद्मावती में भी अपने पुराने अंदाज़ को बरक़रार रखा है।उन्हें अगर ‘शो मैन’ कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। उनकी फिल्मों का एक स्टाइल है। उनकी फिल्मों में एक भव्यता दिखाई देती है जो आप सिनेमा हॉल में हीं महसूस कर सकते हैं। संगीत में परिवेश-माहौल का पूरा असर दिखाई पड़ता है। इस फिल्म में भी उन्होंने लोकधुन और लोकगीतों का इस्तेमाल किया है। एक तरफ राजस्थान के लोकगीत तो दूसरी ओर शेरो  शायरी और अरबिक वाद्यंत्रों का प्रयोग। मैंने जायसी के पद्मावत को नहीं पढ़ा है लेकिन इस फिल्म को देखकर उसकी कमी नहीं खली। अलाउद्दीन खिलजी की बर्बरता, पद्मावती का सौंदर्य, रा…

जाना -हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया है

हली बार साहित्य संसार के माध्यम से उन्हें सुनने का मौक़ा मिला था लेकिन तब मेरा काम सिर्फ और सिर्फ कार्यक्रम का प्रोडक्शन था।  इसलिए मेरा पूरा ध्यान कैमरे के कोण पर टिका था। कार्यक्रम खत्म होने के बाद हमारी बेहद छोटी और औपचारिक बातचीत हो सकी। शायद 2008 या 2009 की बात रही होगी।  उसके बाद पूरे आठ या नौ साल बाद उनका साक्षात्कार लेने का मौक़ा मिला। ये मौक़ा भी बहुत मुश्किल से मिला था। इसके लिए मैंने जाने कितनी बार उनसे फ़ोन पर बातें की।  हर बार वे तबियत खराब की बात कहकर टाल जाते थे। कभी वे दिल्ली से बाहर होते, जब दिल्ली में होते तो तबियत खराब है बोल कर बात टाल जाते और मैं हर बार उनका साक्षात्कार करने का मेरा जोश कम पड़ जाता। एक दिन जब अनामिका जी के साक्षात्कार के लिए मैं उनके घर पहुंची थी उस दिन वहीं अचानक मेरी मुलाक़ात केदारनाथ जी से हुई। मैंने उनसे बात की और उन्होंने आज्ञा दे दी।
तय दिन उनके घर पहुंचना था। अपनी ओर से पूरी तरह सतर्क थी कि कहीं गलती से भी मुझे
देर ना हो जाए। साक्षात्कार शुरू हुआ।  धीरे-धीरे मैं भी सहज होती गई। उन्होंने अपनी प्रिय
कविता कपास के फूल सुनाई। कविता सुनाने के साथ…