परिवर्तन

धीरे धीरे चलते चलते


दूर कहीं हम आ पहुंचे है


चाहे भी तो ना रूक पाए


वक्त की धार से जूझ रहे हैं ।

Comments

mahendra mishra said…
बहुत सुंदर

Popular posts from this blog

मनुष्य एक सामाजिक नहीं सामूहिक प्राणी है!

महिला दिवस और एक सशक्त महिला

सिर्फ विरोध के लिए विरोध या कुछ और ?