Saturday, November 29, 2008

मुंबई मेरी जान





चमचमाती रोशनी से नहाई
मुंबई की रात
और नगर की पहचान
भव्य ताज
कई ऐतिहासिक घटनाओं की गवाह

लेकिन,
बुधवार की काली रात
देखते ही देखते
छा गया तबाही का मंज़र
मुठी भर दहशतगर्दों के हाथों में थी
सैकडों लोगों की जान

ग्रेनेड के धमाकों
और गोलियों की आवाजों ने
ोडी रात की चुप्पी
देखते ही देखते आग और धुएँ में नहाई थी
मुंबई की भव्यता
देश की आर्थिक राजधानी
डूब गई अंधेरे में.

Tuesday, November 25, 2008

डायरी के पन्नो से

चंदा

बादलों के पीछे से छिपकर
आता है चंदा,
किसी सुन्दरी के माथे पर लगी
गोल बिंदिया सा चमचमाता है चंदा।
कभी यहाँ और कभी वहां
जगह बदलता जाता है चंदा।
कभी कभी इस विशाल आसमान में
घर भी भटक जाता है चन्दा ।
कभी मंदिरों के पीछे, तो कभी दरख्तों के ऊपर
कभी बादलों के पीछे, तो कभी अटारी पर
पहुँच जाता है चंदा।
(ये कविता जब मैं नौवी कक्षा में थी तब लिखी थी। )

आह्वान

हे देश के युवा
भविष्य निर्माता
है अगर ताक़त तुममे
है अगर तुम्हारी शिक्षा में बल
तो बढ़ो आगे और
उखाड़ फेंको
इस अशिक्षा रूपी ठूंठ को
जिससे मिलता नहीं
किसी व्यक्ति को
सहारा
और लगा दो वहां
शिक्षा के हरे भरे पेड़
इन्हे सिचने के लिए
तुम्हारा प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम
के लिए दृढ़ संकल्प होना ही
काफ़ी है।
हे वीरों, देश के युवाओं
तो चलो हम सब मिलकर
देश से तिमिर का अंत कर
उजाला फैलाएं
और देश को शिक्षित बनाएं।
( ये कविता जब मै दसवीं बोर्ड पास करने के बाद लिखी । )

Thursday, November 20, 2008

खामोशी और अँधेरा, फ़िर भी एक नया सवेरा

ईश्वर ने हम सबको सामान्य बनाया तब भी हम हमेशा किसी न किसी परेशानी को लेकर दुखी रहते हैं। हमें ऐसा लगता है की हमारी परेशानी से बढ़कर कोई परेशानी नही है। ईश्वर ने सारे दुःख हमारी झोली में डाल दिए हैं।
पर उन लोगों का क्या जिसे प्रकृति ने असामान्यता दे दी। बीते दिनों कुछ ऐसे ही लोगों से मिलने का मौका मिला। कुछ तो दिखने में इतने समान्य और सुंदर थे की उन्हें देखकर कोई नहीं कह सकता की वो सुन और बोल नहीं सकते। मुझे आश्चर्य और खुशी ये देखकर हुई की कुछ कंपनियों ने ऐसे ख़ास लोगों को अपने यहाँ काम दिया है, और ये लोग समान्य से बेहतर पर्फोमांस दे रहे हैं। इनमे सिखने की ललक औरों से ज़्यादा है। इनमे कुछ कलाकार हैं तो कुछ खिलाड़ी लेकिन अपनी बातों को लोगों के सामने नही रख पाने के कारन ये गुमनामी के अंधेरे में खो गए। इन में से हर एक के परिवार की एक अलग ही कहानी है। एक लड़का, जिसकी माँ मानसिक रोगी, पिता मूक - बधिर, पत्नी भी मूक - बधिर..... अब वो पिता बनने वाला है । उसे डर है की कहीं उसका होने वाला बच्चा भी मूक - बधिर ना हो जाए। एक और परिवार जहाँ माता - पिता और बेटा मूक - बधिर हैं लेकिन बेटे की पत्नी समान्य है। बेटा भी पिता बनने वाला है लेकिन पत्नी को डर है की कहीं वो भी अपने पिता और दादा दादी की तरह ना हो जाए। ये सारे लड़के दिखने में बेहद खूबसूरत, कंप्युटर पर हांथों की गति इतनी तेज़ और सधी हुई की हम लाख कोशिशों के बाद भी वैसी गति अब तक नहीं बना सके हैं। विभिन्न खेलों में भी माहिर, लेकिन ना सुन सकते हैं और ना ही बोल सकते हैं। फ़िर भी उनके चेहरे पर सुकून और संतुष्टि है, और कभी ना ख़त्म होने वाली एक प्यारी सी मुस्कान है।
वहीँ दूसरी तरफ़ एक ऐसे स्कूल में भी जाने का मौका मिला जहाँ बचपन से ही ऐसे ख़ास बच्चों को सिखाने की सुविधा है। इन बच्चों के साथ वहाँ ऐसे बच्चे भी हैं जो बिल्कुल सामान्य हैं। दोनों की संख्या बराबर है। इससे ये होता है की असामान्य और सामान्य दोनों बच्चे साथ खेलते हैं साथ ही पढ़ते हैं । दोनों को एक दूसरे की आदत हो जाती है। अगर ख़ास बच्चों को कुछ परेशानी होती है तो सामान्य बच्चे उनकी सहायता करते हैं। इनके मन में किसी भी तरह की कोई हिचकिचाहट नहीं होती है और ये एक दूसरे का साथ एन्जॉय करते हैं। यही तो नई सुबह का आगाज़ है शायद...?

Monday, October 27, 2008

वेल बिहाव्ड वूमेन ररली मेक हिस्ट्री





लक्ष्मीनगर से पार्लियामेन्ट तक आना और वो भी ऑफिस टाइम यानी सुबह ९ बजे से एग्यारह बजे के बिच, कोई आसान काम नही है । ट्रैफिक की बाढ़ होती है... ऐसा लगता है की जाने कहाँ बहा ले जायेगी। उस समय कोई भी निकलना नही चाहता, यहाँ तक की ऑटो वाले भी ऑफिस का नाम लेने पर कन्नी कटाने लगते हैं। शुक्रवार को मै ऑफिस जा रहीथी।आई टी ओ पर ट्रैफिक करीब पन्द्रह मीनट से रुकी हुई थी । ऐसे बोरियत भरे समय में ध्यान इधर उधर भटकता रहता है। मैं भी सामने खड़ी हर गाड़ी को देख रही थी उसपर लिखे कैप्शंस को पढ़ रही थी। एक पञ्च लाइन ने मेरा ध्यान अपनी और खिंचा और मेरे अन्दर उस गाड़ी के मालिक को देखने की इच्छा हुई। लाइन इंग्लिश में था "वेल बिहाव्ड वूमेन ररली मेक हिस्ट्री". पता नहीं क्यों मैं उस पंक्ति को पढने के बाद पुरे रास्ते उसपर सोंचती रही की क्या जो लिखा है वो सच है... सही है। मुझे लगा की शायद बिल्कुल सही है। घर से बाहर निकलने के बाद एक लड़की हर काम के लिए संघर्ष करना पड़ता है... लड़ना पड़ता है। अगर वो किसी से भी अच्छे से बात करे तो सामने वाला उसे कमज़ोर समझ या तो उसका फायदा उठाने की कोशिश करता है या फ़िर उसे दबाया जाता है। ऐसे मैं परिस्थिति ही ऐसी हो जाती है जो लड़कियों को लड़ने पर मजबूर कर देती है। हर बार आत्मरक्षा के लिए तैयार महिलाऐं कब वेल बिहाव्ड से ईल बिहाव्ड हो जाती हैं पता ही नहीं चलता।

Sunday, September 21, 2008

एड्स: जारी है संघर्ष


पिछले दिनों अपने कार्यक्रम के सिलसिले में मैंने एड्स रोगियों से मुलाक़ात की कोशिश की । ये काम इतना आसान भी नहीं था। काफ़ी नेट सर्फिंग के बाद कुछ एनजीओ का पता मिला जो इनलोगों के लिए काम करते हैं। पता लेकर आनन फानन में मैं उनसे मुलाक़ात तय कर मिलने के लिए चली गई। कुछ इंतज़ार के बाद मेरी मुलाक़ात उस आरगेनाइजेशन को चलाने वाले से हो गई। छोटे से परिचय के बाद काम की बात शुरू हुई। मैंने अपने कार्यक्रम के बारे में बताया , ये भी कहा की मुझे एड्स रोगी से मिलना है, उनके परिवारवालों से मुलाक़ात करनी है। इधर उधर की बात के बाद वो सज्जन समझाने लगे की क्या कोई एड्स रोगी कैमरा के सामने आएगा...नहीं। जब कोई भी व्यक्ति एच आई वी पोसिटिवे होता है तो उसके सामने सबसे पहले उसका परिवार आता है... फ़िर ज़िन्दगी जीने की समस्या आती है, फ़िर सवाल उठता है की आख़िर ज़िन्दगी जीने के लिए अहम् चीज़ ....पैसा ,कहाँ से आएगा.....ये सारी समस्याओं को बताने के बाद वे मुझसे पूछे की क्या हमारा चैनल उन्हें पैसे भी देगा? मैंने पैसे देने में अपनी असमर्थता ज़ाहिर की और कहा की हम उनकी समस्याओं को लोगों के सामने लायेंगे, पर इसके लिए उन्हें हमारा साथ देना होगा। इसके बाद वे सज्जन बहुत तरह की बातें करते रहे, फ़िर मुझसे पूछा की अगर मान लो हम साथ में काम कर रहे हैं , हम दोनों के बिच अच्छी दोस्ती भी हो, और तीन चार साल के बाद अचानक तुम्हे पता चले की में एच आई वी पोसिटिव हूँ तुम्हारी क्या प्रतिक्रिया होगी। मुझे पहले तो समझ नहीं आया की क्या जवाब दूँ, सिर्फ़ इतना ही कह सकी की मुझे अफ़सोस होगा।
इसके बाद उन्होंने कहा की वे मेरी मदद करेंगे पर इसके लिए मुझे एक कंसेंट फॉर्म साइन करना पड़ेगा। में ओके कर दी। उसके बाद तय हुआ की जहांगीरपुरी में मेरी मुलाक़ात एच आई वी पोसिटिव महिला से होगी। तय दिन हम निकल पड़े , और पहुँच गए जहांगीरपुरी। उस महिला से मैंने पूछा की आखिर कैसे वे पोसिटिव हो गयीं और उन्हें इसका पता कैसे चला? वे बताई की उन्हें ये बिमारी उनके पति से मिली है और इस बीमारी की ख़बर तब हुई जब उनका पति अक्सर बीमार रहने लगा। जब डॉक्टर ने उसके सारे चेक उप करवाए तब पता चला की उसे ये बीमारी है फ़िर महिला की भी जांच की गई तो उसमे भी ये वाइरस था और उसकी बेटी जो उस वक्त चार या पाँच महीने की थी उसे भी ये बीमारी थी। उसके बाद उस औरत का पति, ये सोचने लगा की उसकी पत्नी के चाल चलन सही नही थे, इसलिए उसे ये बीमारी हुई । इसके लिए अभी भी पति , पत्नी को दोषी मानता है, साथ ही उसे खूब मारता पिटता है ।हलाँकि इस बारे में उनलोगों ने अपने परिवार में किसी को भी नहीं बताया है। ये सिर्फ़ पति -पत्नी को पता है। एनजीओ ने भी उनलोगों को अपनी बिमारी के बारे में किसी से भी कहने से मना कर रखा है। वे महिला बता रही थी की अगर किसी को पता चल जाए की सामने वाला ऐड्स का रोगी है तो उसके साथ बहुत ही बुरा व्यवहार किया जाता है। यहाँ तक की डॉक्टर और नर्स भी उनकों छूने से डरते हैं। उनके लिए काम करने वाले जो एनजीओ हैं उसके कार्यकर्ता भी उस बोत्तल से पानी पीना पसंद नहीं करते जिससे ऐड्स रोगियों ने पानी पिया हो।

Tuesday, September 16, 2008

मेरी बातें

बहुत दिनों से कुछ नहीं लिख सकी ऐसा नहीं था की लिखने की चाहत नहीं थी , वास्तव में कुछ समय की कमी और थोड़े से आलस ने मुझे ब्लॉग लेखन से दूर कर दिया था। हर दिन सोचती थी की आज ये लिखूंगी आज वो लिखूंगी, लेकिन जब ऑफिस पहुँचती तो काम के सिवा कुछ याद नहीं होता था और घर पहुँचने के बाद थकान से कुछ याद नहीं रहता ।
शनिवार का दिन भी आम दिन की तरह ही था। मैंने अपने प्रोग्राम के कवर स्टोरी के लिए कुछ लोगों से बातें की हुई थी । शूट के लिए करीब एक बजे निकली। रास्ते में ही तय किया की शूट ख़त्म करने के बाद कनात प्लेस में जाकर कुछ जनरल शॉट्स बनायेंगे और अपना पीटीसी भी वहीं सेंट्रल पार्क में करेंगे । स्टोरी शूट में ही देर हो गई और कनात प्लेस पहुँचने में पौने पाँच बज गए । वहां पहुँच कर हमलोगों ने शूटिंग शुरू कर दी । हमें थोड़ा आश्चर्य ये हो रहा था की आमदिनों के मुकाबले उस दिन भीड़ थोडी कम थी। मैंने अपने कैमरामैंन से भी कहा की आज भीड़ कम है। छः बजे मेरे भाइयों का फोन आया, वे मुझे पिक करने सीपी ही आ रहे थे। मैंने उस दिन का शूट कैंसिल कर दिया, और दूसरे दिन के लिए तय कर दिया। मुझे क्या पता था की ये मेरा सौभाग्य है जो मुझे सेंट्रल पार्क जाने से रोक रहा था। उस दिन जैसे ही हम (मैं और मेरे दोनों भाई ) घर पहुंचे विस्फोट की ख़बर मिली। हमने ज्योंहीं टीवी चलाया असलियत देखकर दिल दहल गया। असल में जैसे जैसे हम अपनी गाड़ी से गुज़रे थे चाँद मिनट बाद वहां विस्फोट हुआ था । समझ नहीं आ रहा था की इस आतंकी कार्यवाई पर रोएँ या फ़िर अपने सौभाग्य पर खुश हों। वहां हर तरफ़ चीख पुकार मची थी । एक इच्छा ये भी हुई की काश मैं वहां होती उनलोगों की कोई तो सहायता कर पाती, पर फ़िर ये भी लगा की अच्छा है की मैं वहां नही थी वरना, वो दृश्य सामने देखकर मैं शायद कुछ करने की स्थिति में नहीं होती। अंत में सिर्फ़ इतना की हे इश्वर जो पीड़ित हैं उन्हें ये सहने की शक्ति दो... जो इन घटनाओं में दम तोड़ चुके उनकी आत्मा को शान्ति दो और जो ऐसी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं.... जिनके हाथ ऐसा करने पर भी सलामत हैं, उन्हें हे इश्वर थोडी सद्बुद्धि दो।

Friday, July 25, 2008

(२)


एक तरफ़
पूर्णमासी का चाँद
तुम चांदनी

(१)







पलकों से गिरे

आँसू, बन गए मोती

बेशकीमती रत्न ।







Sunday, June 22, 2008

नम हुई आंखें

अभी कुछ दिन पहले ही एक अखबार के छोटे से कॉलम में पढ़ी की बिहार के किशनगंज की रहने वाली एक महिला को उसके पति ने ही दिल्ली में बेच दिया । वो तो उस महिला की बहादुरी थी और एक संस्था की दिलेरी जिससे वो महिला अपनी अस्मत बचाने में कामयाब रही। हालाँकि अन्य अखबारों या खबरिया चैनलों में इसकी चर्चा मुझे दिखी नहीं। शायद उनके लिए ये बड़ी ख़बर नहीं थी क्योंकि अब तो ऐसी घटनाएं आम हो गई है। मेरा ध्यान इस कॉलम की ओर इसलिए गया क्योंकि इस घटना से कुछ दिन पहले ही मुझे इस विषय पर काम करने का मौका मिला था। उस दौरान मेरी मुलाक़ात इसी संस्था के संचालक से हुई थी जो लंबे समय से लड़कियों और महिलाओं को खरीद फरोख्त से बचाने और उन्हें सशक्त करने के प्रयास में जुटे हुए हैं। उन्होंने बताया की कैसे लड़कियों की खरीद फरोख्त में एक पुरा गिरोह काम करता है। ऐसे गिरोह के चंगुल में ख़ासतौर पर वैसे लोग या वैसे परिवार फंसते हैं, जो बेहद गरीब होते हैं , जिनके घर में बेटियाँ ज़्यादा होती हैं। दिल्ली, मुंबई, हरियाणा,जयपुर और आगरा में इनके ग्राहक ज़्यादा होते हैं।
सवाल उठता है लडकियां लायी कहाँ से जाती हैं? एक अध्ययन से ये बात सामने आई है की पड़ोसी देशों से करीब १० प्रतिशत लडकियां यहाँ लायी जाती हैं, वही देश के अन्य राज्यों से लायी जाने वाली लड़कियों की संख्या करीब ८९ फीसदी है। बांग्लादेश से लायी गई लड़कियों को आमतौर पर कोल्कता के चकलाघर में पनाह मिलता है। वहां से लड़किया भारत के अन्य शहरों में बेचीं जाती हैं। ठीक इसी तरह नेपाल से भी बड़ी संख्या में लड़कियों को लाया जाता है। किसी भी लड़की का दाम उसकी उम्र और सुन्दरता पर निर्भर करता है, और वो चार सौ से लेकर सत्तर हज़ार तक हो सकता है। इन्हें आमतौर पर घरेलू काम, उद्योग धंधे , चकलाघर या फ़िर शादी के लिए बेचा जाता है। जो लडकियां चकलाघर में बेचीं जाती हैं उन्हें हर दिन एक नए जुल्मोसितम का सामना करना पड़ता है। भूखा रखना, मारना पीटना , जलाना ये तो रोज़ का काम है, कभी कभी तो उन्हें जान से भी हाथ धोना पड़ता है।
सच है ये दुनिया जितनी खूबसूरत नज़र आती है उतनी है नहीं । मुझे ऐसी पीड़ित और शोषित बच्चियों से मिलने का मौका भी मिला। उनकी आँखों में सूनापन और उदासी थी। उनमे से कई तो अपने घर का पता भी नहीं जानती थी, फिलहाल उनका आशियाना बना हुआ है एक स्वयंसेवी संस्था का बाल आश्रम । मेरी बातें अभी भी अधूरी है.................

Saturday, June 21, 2008

कामयाबी की कहानी

अब तक किस्से कहानियो में ही सुना करती थी की कैसे एक गाँव की अनपढ़ महिला संघर्ष कर लोगों के लिए एक मिसाल बन गई। लेकिन पहली बार अपनी आँखों से देख सकी उस महिला को जिसने आज से करीब अस्सी साल पहले भोजपुर जैसे इलाके में व्यापार में योगदान देकर एक नई शुरुआत की। मैं बात कर रही हूँ भोजपुर के पकडी गाँव की रहने वाली फूलवंती की। ये सच है की फूलवंती को जानने वाले बहुत कम लोग ही मिलेंगे क्योंकि वो दशरथ मांझी की तरह भाग्यशाली नहीं है जिनपर मीडिया की नज़र पड़ सके, लेकिन उसके संघर्ष की कहानी उस गाँव में जाइए तब आपको समझ में आएगी। आज से अस्सी साल पहले का बिहार, अभी की स्थिति देखकर अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है की कैसा रहा होगा। तब लड़कियों की शादियाँ बचपन में ही कर दी जाती थी। उसके बाद उनका काम गज भर के घूँघट के साथ घर को संभालना हुआ करता था। तब लड़कियों को पढाना सही नहीं समझा जाता था। सातवी पास को ज्यादा पढ़ी लिखी समझा जाता था। तब शादी के बाद औरतें घर की चोव्खत को नहीं लांघा करती थी। कहानी तब की है ... फूलवंती के पति का काम खेती करना था। पैसे की तंगी ने उन्हें क़र्ज़ लेने पर मजबूर कर दिया। फिर शुरू हुआ सिलसिला आर्थिक शोषण का... कभी ना ख़त्म होने वाला क़र्ज़। पति की लाचारी देखकर फूलवंती से नहीं रहा गया और वो निकल पड़ी ऐसे काम की तलाश में जो उसके अपनों को दो जून की रोटी दिला सके। इसी क्रम में वो राजस्थान तक पहुँच गई। रंग बिरंगा राजस्थान जो ना सिर्फ़ पुराने किलों पर लिखी गई इबारतों के लिए प्रसिद्द है बल्कि प्रसिद्द है अपने तीखे मसालेदार व्यंजन के लिए भी। फूलवंती वहां से मसालों को बिहार में लाकर घर घर जाकर बेचना शुरू कर दी। इससे उसे इतना फायदा मिला की उसकी और उसके परिवार की जिंदगी आराम से काटने लगी। धीरे धीरे ये व्यवसाय उनका खानदानी पेशा बन गया। महादलित परिवार से आने वाली इस निरक्षर महिला ने वो कर दिखाया जो तब की साक्षर महिला करने में सक्षम नहीं थी। करीब अस्सी साल बाद आज फूलवंती अपने सौ वसंत पूरे कर चुकी है, इसलिए उसका शरीर इस कार्य में उसका साथ भले नहीं दे रहा लेकिन उस महादलित जाती से आने वाले करीब चालीस से पचास परिवारों ने मसाले के व्यापार को अपना खानदानी पेशा बना लिया है। आज पकडी गाँव के लोग उसकी तारीफ़ करते नही थकते। वे सबके सब फूलवंती के इमानदारी, विश्वास और मेहनत के कायल हैं। दिनकर ने शायद ऐसे ही लोगों को देखकर ये पंक्तियां लिखी होगी
"वह प्रदीप जो दिख रहा है, झिलमिल दूर नहीं है,
थककर बैठ गए क्या भाई, मंजिल दूर नहीं है। "

Monday, June 2, 2008

कम उम्र में शादी और मातृत्व

स्त्री और पुरूष इश्वर की अनुपम रचना हैं। संसार को चलाने के लिए दोनों की ही बराबर की हिस्सेदारी ज़रूरी है। सिंधु सभ्यता की बात हो या फ़िर वेदिक सभ्यता की, स्त्रियों की पूजा इस देश की सभ्यता और संस्कृति में सदियों से निहित है। लेकिन धीरे धीरे जब बाहर से आक्रमणकारियों ने यहाँ धावा बोला स्त्रियों की स्थिति कजोर होती गई। शायद यही वो समय रहा होगा जब से लोग लड़कियों को बोझ मानने लगे होंगे, उनकी सुरक्षा और जिम्मेदारियों से मुक्ति के लिए उनकी जल्दी से जल्दी शादी करने की प्रथा की शुरुआत भी ऐसे ही हुई होगी ।
आज वो प्रथा इस देश के लिए किसी नासूर से कम नहीं। नन्ही उम्र में शादी यानी किसी नन्हें पौधे से फल की अपेक्षा करना, ये मानव की सबसे बड़ी भूल है। अगर कच्ची उम्र में किसी लड़की की शादी की जाती है तो वो लड़की ना ही प्राकृतिक रूप से इसके लिए तैयार होती है ना ही मानसिक रूप से , इसीलिए तो क़ानून में भी लड़कियों के शादी की उम्र अठारह साल तय की गई है। बावजूद इसके आज भी खुले आम बाल विवाह हो रहे हैं, और इसके ख़िलाफ़ कदम उठाने वाला कोई नहीं है। यहाँ तक की राजस्थान में तो एक ख़ास मौके पर सामुहिक बाल विवाह करवाए जाते हैं और वो भी खुलेआम। कच्ची उम्र में शादी की सबसे ज्यादा खामियाजा भुगतना पड़ता है लड़कियों को, क्योंकि वे हर बातों से अनजान होती हैं। उन्हें पता नहीं होता की वे किस बन्धन में बंधने जा रहीं है। उनका शरीर इसके लिए तैयार नहीं होता। किसी भी स्त्री के लिए मातृत्व सबसे खूबसूरत पल होते हैं, लेकिन कच्ची उम्र में वही मातृत्व लड़की के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं। उन्नीस से कम उम्र में माँ बनने वाली मahilaon के डिलिवरी के समय मौत की संभावना बालिग उम्र में माँ बनने वाली से पाँच फीसदी ज्यादा है। भारत में पन्द्रह से उन्नीस साल की चार में से एक लड़की शादीशुदा है। नन्ही उम्र में ब्याही जाने वाली ज्यादातर बच्चियां पति और ससुरालवालों के ज़ुल्म का शिकार होती हैं। ये ज़ुल्म शारीरिक प्रतारना से लेकर मानसिक यातना तक होता है।
कच्ची उम्र में शादी का एक बहुत बड़ा कारन अशिक्षा और गरीबी है। अगर हाल के सर्वेक्षणों पर गौर करें तो पाएंगे की सबसे ज्यादा बाल विवाह राजस्थान में हो रहे हैं। वहाँ पन्द्रह से उन्नीस साल के बीच विवाह के बन्धन में बंधने वाली लड़कियों की संख्या करीब ४१ फीसदी है। आजादी मिलने के बाद से इस देश के haalaat में बहुत बदलाव हैं । कम उम्र में विवाह पर लगाम lagaane की कोशिश भी की गई लेकिन सिलसिला अब भी जारी है। शायद इसके लिए एक गंभीर राजनितिक मंथन की ज़रूरत है या फिर सामाजिक चिंतन की , तभी तो जागरूकता के साथ एक नया आगाज़ होगा और देश तरक्की के नए मुकाम तय करेगा।

Sunday, May 11, 2008

एक मुलाक़ात

एक कार्यक्रम के सिलसिले में मुझे उषा राय से मुलाक़ात करने का मौका मिला। जी हाँ वही उषा राय जिनका नाम उन महिला पत्रकारों में शामिल है जिन लोगों ने साठ के दशक में पत्रकारिता में महिलाओं को एक मुक़म्मल स्थान दिलाने की एक पहल शुरू की थी। उनसे मुलाक़ात के बाद कई ऐसी जानकारियाँ मिली जो हम जैसे नए पत्रकारों के लिए ख़ास था। आज महिला पत्रकारों की जैसी स्थिति है हमेशा से वैसी नही थी। ये उस समय की महिला पत्रकारों के प्रयास का हीं कमाल है की आज महिलाऐं बिना किसी पाबन्दी या मुश्किलात के आसानी से पत्रकारिता कर पा रही हैं। साठ के दशक में महिलाओं को पत्रकार रखा ही नहीं जाता था। उषा जी ने एक और महिला पत्रकार प्रभा दत्त की कहानी बताई की कैसे जब वे एक प्राइवेट अखबार में नौकरी के लिए गयी तो उन्हें सिर्फ़ इसलिए मना कर दिया गया क्योंकि वे एक महिला थी। डेढ़ साल बाद उसी अखबार ने एक महिला को डेस्क पर रखा तब प्रभा जी ने उस अखबार के दफ्तर का दरवाज़ा फ़िर खटखटाया और कहा की जब उस महिला को वहाँ काम मिल सकता है तो उन्हें क्यो नही। अंत में जीत प्रभा जी की ही हुई। यही नही पहले महिला पत्रकारों के लिए मतेर्निटी लीव जैसी कोई सुविधा नही दी जाती थी। इसके लिए भी तब महिला पत्रकारों ने काफ़ी मशक्कत की। तब महिलाओं से या तो डेस्क पर काम लिया जाता था या फिर सॉफ्ट स्टोरी को कवर करने के लिए कहा जाता था।
आज समय बदल गया है, महिलाओं को हर क्षेत्र में भागीदारी मिल रही है। पर आज भी हर बार महिलाओं को पहले ये साबित करना होता है की वे अपने कार्य को लेकर गंभीर हैं, तब जाकर लोग उसे गंभीरता से लेते हैं। हर बार महिलाओं को ये साबित करना होता है की वे सिर्फ़ अपना जॉब करना चाहती हैं। हलाकि क्षेत्रीय स्तर पर आज भी महिला पत्रकारों की स्थिति में ज्यादा का अन्तर नहीं है। आज भी वहाँ महिलाऐं सुब एडिटर से ज्यादा कुछ नही बन पाती। आज भी उन्हें पैसे दिन के हिसाब से मिलते हैं। आज भी उन्हें यही समझा जाता है की वे अगर पत्रकारिता में आई हैं तो सिर्फ़ पति खोजने के लिए। आज भी क्षेत्रीय स्तर पर अखबारओं के बहुत कम ऐसे कार्यालय हैं जहाँ महिला पत्रकारों के लिए अलग से वाश रूम की व्यवस्था हो। लेकिन चाहे कुछ हो पर इतना तो यकीं है की आज नहीं तो कल वहाँ भी महिला पत्रकारों की स्थिति सुधरेगी। चलते चलते जब इतनी दूर निकल आए, तो यकीं है की हम आस्मान भी छू लेंगे।

Saturday, May 10, 2008

गौरैया












 गौरैया
हर रोज़
तिनका चुन कर लाती है-
मेरे घर के छज्जे पर
एक घोंसला
अब तो बन चुका है
उनमें 
छोटे छोटे अंडे भी हैं 

गौरैया
दिन भर उन्हें
सेती है ,

चंद रोज़ बीते -
और ... आज 
चूजे भी निकल आए

गौरैया
अपने बच्चों के लिए
खाना लाती है,
उनकी चोंच में डालकर
फुर्र से उड़ जाती है ।

हमारा घर
चिडियों का खेल्गाह
बना
हुआ है ।

धीरे धीरे
गौरैया
बच्चों को 
उड़ना सिखाती है-
गिरते - सँभलते वे भी
उड़ना सीख लेते हैं,
और फिर  एक दिन
फुर्र...
घर का छज्जा फ़िर
वीरान  हो गया ।


समय

सुनने की कोशिश करती हूँ
आने वाले समय की आहट
ताकि तैयार कर लूँ ख़ुद को
हर परिस्थिति के लिए।
लेकिन
समय आता है दबे पाँव और
पल भर में तबाह कर देता है।
जन्म,मृत्यु,सुख, दुःख,
सब समय हीं दिखलाता है ,
वह है मदारी और हमें
बन्दर की तरह नचाता है ।

Thursday, May 8, 2008

एक पहल

हर रोज़ ऑफिस आते - जाते समय जंतर मंतर से होकर गुजरना पड़ता है, और हर रोज़ मेरी नज़र 1984 भोपाल गैस कांड के भुक्तभोगियों को न्याय दिलाने के लिए धरना पर बैठे उन लोगो पर पड़ती है जो तेज़ धूप हो या फ़िर आंधी-तूफ़ान अपनी जगह पर डट कर बैठे हुए हैं और ये तय कर लिया हैं की वे तब तक लड़ते रहेंगे जब तक उन्हें न्याय नहीं मिल जाता। आश्चर्य होता है ये देख कर की इनलोगों की खबरें ना तो अखबारों में पढ़ने को मिलती हैं और ना हीं किसी न्यूज़ चैनल पर देखने को मिलती हैं । ऐसा भी नहीं कह सकते की उनकी मांग नाजायज़ है । धरने पर बैठे ज्यादातर लोग आज भी तब की लापरवाही की सज़ा भुगत रहे हैं। कई सवाल ऐसे हैं जिनका जवाब अब तक नहीं मिल सका है। बीस साल पहले भोपाल में यूनियन कार्बाइड और डॉ केमिकेल्स की फैक्ट्री से निकले सफ़ेद धुएँ ने लाखों लोगों की ज़िंदगी तबाह कर दी । मेथाइल आइसोसाइनेट गैस के रिसाव का प्रभाव आज भी वहाँ देखने को मिलता है। आज भी वहाँ के पानी में ज़हर घुला हुआ है। उस समय जो भी बच्चे पैदा हुए आज वो बीस साल के हो चुके होंगे । आख़िर उनकी क्या गलती रही होगी जो आज वो किसी ना किसी अपंगता का शिकार हैं। क्या कुछ पैसे देकर, कुछ मुआवजा देकर हम उनकी कमियों को पुरा कर सकते हैं शायद नहीं।

Monday, April 21, 2008

तुम कहो

वो शाम याद करो

जब मैं हार कर रो रही थी।

तुमने कहा था

उठो, लडो और आगे बढ़ो

मैं लड़ी और आगे बढ़ी

तुमने कहा और आगे बढ़ो

मैं और आगे बढ़ी

मैं आगे बढ़ती गई

और अब तुम कह रहो हो वापस आ जाओ

क्या सम्भव है वापस आ पाना।

Saturday, April 19, 2008

छोटे शहर की याद

छोटे शहर की याद बहुत आती है

वो सुबह सुबह पूजा की घंटियों की आवाजें

फिर फेरीवाले और दूधवाले की पुकार

शाम में समोसे और चाय का साथ ।

जी करता है कुछ वक्त निकाल कर

बड़े शहर की भागदौड़ से बहुत दूर

चली जाऊ वापस उस छोटे शहर की गोद में

फिर से वही खुलापन , वही सरलता

छोटी छोटी बातों पर खुश हो जाना

छोटी बात पर उदास हो जाना

पड़ोस के सुख दुःख में साथ निभाना

पर अफ़सोस अब बहुत ही मुश्किल है

वापस जा पाना।

Monday, April 14, 2008

परिवर्तन

धीरे धीरे चलते चलते


दूर कहीं हम आ पहुंचे है


चाहे भी तो ना रूक पाए


वक्त की धार से जूझ रहे हैं ।

Friday, February 1, 2008

संगीत

हर ध्वनि एक संगीत को जन्म देती है। चाहे वो लहरों की कल कल हो या फिर चिडियों कि चहचः प्रत्येक स्वर में एक संगीत है। कोई भी संगीत हमे अध्यात्म कि ओर ले जाता है, चाहे वो शास्त्रीय संगीत हो या फिर सूफियाना कलाम। संगीत के संबंध में भारत अपने अतीत पर गर्व कर सकता है। भारत में संगीत कि परम्परा का आरंभ वैदिक काल से ही माना जाता है। बाद कि शताब्दियों में इसे सुव्यवस्थित कर संहिताबध किया गया। संगीत का विकास क्षेत्रीय कला के अनुसार लोकशैली में हुआ। धीरे धीरे उसने शास्त्रीय रुप धारण कर लिया। लेकिन फिर भी संगीत के सात सुर हर शैली में एक से ही लगते हैं। वहीं वाधयंत्र के इतिहास पर जब नज़र डालते हैं तो यही एहसास होता हैं कि शुरुआत में बांसूरी, नद्स्वरम, वीना, गोत्त्वाध्यम,मृदंगम और ढोल जैसे क्षेत्रीय यन्त्र ही उपलब्ध थे । सितार और तबला काफी बाद में आये।
अब तो और भी नए वाध्ययंत्रों पर प्रयोग जारी हैं। इनमे अनेक भारतीये संगीताग्याओं के नाम भी शामिल हैं, चाहे पंडित रविशंकर हों या फिर अमजद अली खान । खासतौर पर रविशंकर ने तो एक वाध्ययंत्र कि स्वर लिपि तैयार करने में विशेष निपुणता हासिल कर ली है। इन्होने भारतीय और पश्चिमी संगीत का समिश्रण तैयार किया है। इन्होने पॉप और जाज़ संगीतज्ञों के साथ अनेक स्वर्लिपियाँ तैयार कि हैं। ताल वाद्यों के संबंध में भी इस बात कि बहुत कोशिश कि गयी कि सभी ताल्वाध्यों के लिए साझा मंच हो। तबला वादक जाकिर हुस्सैन ने इस दिशा में कई काम किये हैं। ये प्रयास काफी सफल भी रहे हैं।क्योंकि लय का प्रभाव सार्वभोव्मिक है। इसमें क्षेत्रीय या राष्ट्रीय पूर्वाग्रह कि गुंजाईश नहीं होती।

Thursday, January 17, 2008

नवयुगल

घन छाया नभ में अभी अभी
बादल गरजे है बार बार।
अब गरज गरज बरसे है घन
धरती भींगी है झूम झूम

तरुणी भाई है ये धरती
वरुण भी हुआ है तरुण अभी ।
हवा के झोंके धरती को
चूम चूम करते हैं प्यार
तब झूम झूम नाचे है
मन का मयूर बार बार।
नवयुवती सी ये धरा
रहे खिली खिली

जब पड़े फुहार।
सब कहे इस नवयुगल को
बस प्यार प्यार, बस प्यार प्यार।

आदमी

आदमी,
मंच पर खड़ा होकर
लाखों जनता के सामने कहता है
भारत कि स्त्रियाँ "सीता और सावित्री" हैं
मैं उनका सम्मान करता हूँ।
तालियों कि आवाज़
जनता आदमी कि जयकार करती है।
आदमी,
अन्धकार में "दुह्शासन" बन जाता है।
"सीता और सावित्री"उसे
"द्रोपदी"नज़र आती है ।
द्रोपदी "विलाप करती है
लेकिन आज...
कोई " कृष्ण " नहीं आता
जनता " कौरव " बन जाती है।
और ,
" द्रोपदी " कि चीत्कार
कौरवों के अट्टहास में खो जाती है।


Sunday, January 13, 2008

vivekanand

शूद्र कहे जाने की पीड़ा, विवेकानंद की जुबानी
-दिलीप मंडलअद्वैत मत की ध्वजा पश्चिम में लहराने वाले स्वामी विवेकानंद का आज जन्मदिन है। इसलिए विवेकानंद को नए सिरे से पढ़ना शुरू किया- खंड एक, फिर दो, फिर कुछ चिट्ठियां और खंड तीन। खंड तीन में स्वामीजी का मद्रास के विक्टोरिया हॉल में भाषण। विश्व धर्म महासम्मेलन के बाद मद्रास में उनका स्वागत हुआ। भीड़ इतनी थी कि स्वागत समारोह में उनका भाषण नहीं हो पाया। यही भाषण बाद में विक्टोरिया हॉल में दिया गया। पूरा भाषण आप इस साइट पर देख सकते हैं। यहां उस भाषण के एक अंश का अनुवाद प्रस्तुत है। मूल इंग्लिश उसके नीचे पढ़िए। ये अंश इसलिए, क्योंकि ये विवेकानंद की उस बहुचर्चित-ज्ञात छवि से प्रस्थान है, जिसके बारे में सभी जानते हैं। पढ़िए विवेकानंद को :"समाज सुधारकों की पत्रिका में मैंने देखा कि मूझे शूद्र बताया गया है और चुनौती दी गई है कि शूद्र संन्यासी कैसे हो सकता है। इस पर मेरा जवाब है : मैं अपना मूल वहां देखता हूं जिसके चरणों में हर ब्राह्मण ये कहते हुए वंदना करता है और पुष्प अर्पित करता है - यमाय धर्मराजाय चित्रगुप्ताय वै नम:। और जिनके पूर्वपुरुष क्षत्रीय में भी सबसे पवित्र गिने जाते हैं। अगर आप अपने धर्मग्रंथों और पुराणों पर विश्वास रखते हैं तो उन तथाकथित सुधारकों को ये मालूम होना चाहिए कि अतीत में दूसरे योगदान के अलावा मेरी जाति ने कई सदियों तक लगभग आधे भारत पर शासन किया है। अगर मेरी जाति की बात छोड़ दी जाए तो वर्तमान भारतीय सभ्यता में क्या शेष रह जाएगा। सिर्फ बंगाल में ही मेरी जाति ने सबसे महान दर्शनशास्त्री, सबसे महान कवि, सबसे महान इतिहासकार, सबसे महान पुरातत्ववेत्ता, सबसे महान धर्मप्रचारक दिए हैं। हमारी जाति से भारत के सबसे महान आधुनिक वैज्ञानिक पैदा हुए हैं। इन विरोधियों को इतिहास का ज्ञान होना चाहिए और जानना चाहिए कि ब्राह्मण, क्षत्रीय और वैश्य इन तीनों जातियों को संन्यासी बनने का समान अधिकार है। उन्हें वेद पाठ करने का भी समान अधिकार है। वैसे ये तो एक बात है। यदि वो मुझे शूद्र कहते हैं तो भी मुझे कोई कष्ट नहीं है।" (one word more: I read in the organ of the social reformers that I am called a Shudra and am challenged as to what right a Shudra has to become a Sannyasin. To which I reply: I trace my descent to one at whose feet every Brahmin lays flowers when he utters the words — — and whose descendants are the purest of Kshatriyas. If you believe in your mythology or your Paurânika scriptures, let these so-called reformers know that my caste, apart from other services in the past, ruled half of India for centuries. If my caste is left out of consideration, what will there be left of the present-day civilisation of India? In Bengal alone, my blood has furnished them with their greatest philosopher, the greatest poet, the greatest historian, the greatest archaeologist, the greatest religious preacher; my blood has furnished India with the greatest of her modern scientists. These detractors ought to have known a little of our own history, and to have studied our three castes, and learnt that the Brahmin, the Kshatriya, and the Vaishya have equal right to be Sannyasins: the Traivarnikas have equal right to the Vedas. This is only by the way. I just refer to this, but I am not at all hurt if they call me a Shudra.)दरअसल इस भाषण में विवेकानंद की ये पीड़ा आप देख सकते हैं जो उन्हें कुछ समाज सुधारकों ने दी है। इससे आप आंबेडकर की पीड़ा को बेहतर समझ सकते हैं। फुले और शाहूजी महाराज को बेहतर जान सकते हैं। दलित लेखन में जो कड़वाहट किसी को असांस्कृतिक और असभ्य लगती है, उसके समझने का सूत्र विवेकानंद देते हैं। इसके अलावा विवेकानंद रचना समग्र में कदाचित सिर्फ एक और जगह स्वामीजी अपने जाति मूल की बात करते हैँ। समुद्र यात्रा पर निकलने से पहले वो इस बात का जिक्र करते हैं कि "अंग्रेजों ने सभी जाति के लोगों को एक साथ नेटिव करार दिया है।" यहां वो इस बात का जिक्र करते हैं कि "कायस्थ कुल में जन्म होने के कारण उन्हें कई तबकों के हमले झेलने पड़े। और कि सभी जातियां खुद को कायस्थों से श्रेष्ठ मानती हैं।" मूल उद्धरण नीचे देखें :Well, in our country we hear much about some people belonging to the gentry and some to the lower classes. But in the eyes of the Government all are "natives" without exception. Maharajas, Rajas, Brahmins, Kshatriyas, Vaishyas, Shudras — all belong to one and the same class — that of "natives". The law, and the test which applies to coolies, is applicable to all "natives" without distinction. Thanks to you, O English Government, through your grace, for a moment at least I feel myself one with the whole body of "natives". It is all the more welcome, because this body of mine having come of a Kâyastha family, I have become the target of attack of many sections. Nowadays we hear it from the lips of people of all castes in India that they are all full-blooded Aryans — only there is some difference of opinion amongst them about the exact percentage of Aryan blood in their veins, some claiming to have the full measure of it, while others may have one ounce more or less than another — that is all. But in this they are all unanimous that their castes are all superior to the Kayastha! And it is also reported that they and the English race belong to the same stock — that they are cousins-german to each other, and that they are not "natives". And they have come to this country out of humanitarian principles, like the English. And such evil customs as child-marriage, polygamy, image-worship, the sutti, the zenana-system, and so forth have no place in their religion — but these have been introduced by the ancestors of the Kayasthas, and people of that ilk. Their religion also is of the same pattern as that of the English! And their forefathers looked just like the English, only living under the tropical sun of India has turned them black! स्वामी जी जाति प्रथा के विरोधी नहीं है। वो जिस कालखंड में हिंदू समाज के विकास की कल्पना कर रहे थे, और जिन लोगों के बीच ये कल्पना की जा रही थी, उन स्थितियों में जाति प्रथा का विरोध संभव भी नहीं था। लेकिन उनके भाषण का एक और अंश देखिए - "हे ब्राह्मणों, अगर ब्राह्मणों में अछूतों की तुलना में सीखने की प्रवृत्ति ज्यादा है तो ब्राह्मणों की शिक्षा पर और खर्च न किया जाए। बल्कि ऐसा सारा खर्च अछूतों की शिक्षा पर किया जाए। कमजोर को ही मदद की जरूरत है। अगर ब्राह्मण जन्मना समझदार है तो वो किसी सहायता के बिना शिक्षा प्राप्त कर लेगा। अगर बाकी लोग जन्म से समझदार नहीं हैं तो उनके लिए शिक्षा और शिक्षकों का बंदोबस्त किया जाए। मुझे तो लगता है कि यही न्याय है और यही सही है।" इसी भाषण में स्वामीजी ने कठोपनिषद को उद्धृत करते हुए कहा था - उतिष्ठत, जाग्रत, प्राप्य वरान्निबोधत।Ay, Brâhmins, if the Brahmin has more aptitude for learning on the ground of heredity than the Pariah, spend no more money on the Brahmin's education, but spend all on the Pariah. Give to the weak, for there all the gift is needed. If the Brahmin is born clever, he can educate himself without help. If the others are not born clever, let them have all the teaching and the teachers they want. This is justice and reason as I understand it. Our poor people, these downtrodden masses of India, therefore, require to hear and to know what they really are. Ay, let every man and woman and child, without respect of caste or birth, weakness or strength, hear and learn that behind the strong and the weak, behind the high and the low, behind every one, there is that Infinite Soul, assuring the infinite possibility and the infinite capacity of all to become great and good. Let us proclaim to every soul: — Arise, awake, and stop not till the goal is reached.विवेकानंद लगातार ये रेखांकित करते हैं वो समाज सुधारक नहीं है। वो अपने देश के अतीत को लेकर शर्मिंदा तो कतई नहीं हैं। बल्कि वो लगातार आह्वान करते हैं कि देश और समाज को अतीत के साथ निरंतरता रखते हुए आगे बढ़ना चाहिए। विवेकानंद को भारत में कम पढ़ा गया है। या फिर चुन-चुन कर उनकी कुछ बातें रखी जाती हैं। विवेकानंद को और ज्यादा जानने की जरूरत है।
Posted by दिलीप मंडल तारीख़ Sunday, January 13, 2008 (साभार-मोहल्ला)

Wednesday, January 9, 2008

चैनलों की होड़

१.
टीआरपी बढ़ाने के चक्कर में चैनल क्या क्या नही करते। अफ़सोस होता है जब वे हद को पार कर जाते हैं। ऐसे ही एक दिन इंडिया टीवी में जॉन अब्राहम के गर्दन पर उभरे लाल निशाँ के बारे में परताल चलती रही वो भी पूरे एक घंटे तक और लाइव. जानने कि कोशिश कि जा रही थी कि आख़िर ये निशाँ कैसे हैं। कही वे लव बाईट तो नहीं। उस खबरनामा में ये भी विस्तार से बताया गया था कि इससे पहले कौन कौन से हीरो और हिरोइन के शरीर पर ऐसे निशान देखे गए थे , कब देखे गए थे और शरीर के किस हिस्से पर देखे गए थे। उस एंकर के हिम्मत कि दाद देनी पड़ेगी जो एक घंटे तक बिना हिचकिचाहट के कैमरे के सामने इस पर चर्चा कराती रही।


२.
सिडनी में भारतीय खिलाड़ियों के साथ जो कुछ भी हुआ सभी ने उसे देखा और गलत ठहराया। इस दौड़ में खबरिया चैनलों में होड़ लगी थी कि कौन किससे और कैसे आगे निकलता है। किसी ने लाइव किया तो किसीने देश - विदेश से प्रतिनिधियों को बुला कर चर्चा करनी शुरू कर दी। सबसे मजेदार रहा जब एक चैनल ने तो सीधे सीधे सचिन तेंदुलकर को लगान फिल्म का आमिर खान ही बना दिया और " बार बार हाँ बोलो यार हाँ " गाने पर उनके शोट्स लगाकर पैकेज बना दिए । एक चैनल में कार्टून था कि सचिन दुदुम्भी बजा रहे हैं और पीछे भज्जी खडे हैं। .