Friday, October 5, 2007

स्कूल कि यादें

नीले आकाश में

यादों का पंछी

उड़ता चला जाता है

और याद आता है

मेरा स्कूल और

नीम का वो पेड

ईमली के पत्ते

और बेल से लदे
पेड़

फूलों की क्यारी

मिटटी कि गलियारी

टीचर कि डांट

आलू का चाट

होम्सईन्स की घंटी में

हमारी नौटंकी

डांस के पीरियड मे

स्कूल से भागने की टंटी

मुझको तो याद
है

प्यार की वो रेल पेल

क्षण में झगड़ना

और क्षण में मेल

आम के
टीकोले

हम थे कितने
भोले

बिल्कुल मंझोले ।

बादाम का वो पेड


छत का खपरैल

टबिल टेनिस का खेल

बिर्जा जीजी का जेल ।

टिफिन मे कबड्डी

अचार की छीना झपटी

आपस मे लड़ना

फिर सबको मनाना

रोना और रुलाना

फिर हँसना हँसाना

क्या भूल सकना आसान है

बिता वो जमाना ?

1 comment:

शेष said...

नीले आकाश में/ यादों का पंछी/ उड़ता हुआ जाता है स्कूल/खाकर आता है टीचर की डांट के साथ-साथ आलू की चाट/ हम सारे भोले लोग/ बहुत पीछे छोड़ आए हैं/ आम के टिकोले और हर पल के मीठे झगड़े/ जाने किस रेल पर सवार होकर हम वह सब कुछ पीछे छोड़ आए हैं/ क्या सब कुछ पीछे छोड़ आना ही आखिरी रास्ता है/ क्या कुछ भी साथ लेकर नहीं चल सकते हम/ बताओ जरा कि यादों के इस पंछी को/ अपने पहलू से कैसे छोड़ आसमान में/ कभी वापस नहीं आने के लिए/ क्या यह पूरी तरह मुमकिन है/ कुछ भी भूल सकना आसान नहीं है/

यह भी कि अब आपका स्कूल बदल चुका है और उसकी घंटियों का वक्त भी। अब बात कुछ आगे बढ़े, ताकि उस पंछी का संदेशा भी हमें पढ़ने को मिले।

अनंत चतुर्दशी-संस्मरण

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