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यादें

मेरा घर

मेरे अपने

और वो मीठी बातें

चाय की चुस्कियों के साथ

जब कटती थी दिन और
रातें

यादें और बस यादें ।

मेरा कमरा

मेरा बिस्तर

और वो दीवारें

जिसके इस पार और उस पार

सजती थी ढेरों तस्वीरें बार बार

मेरी बगिया इस बार

कह रही थी बार बार

करो मेरा श्रृंगार

फिर से करो मेरा श्रृंगार ।

माँ की झिड़की

पापा का ग़ुस्सा

क्यो याद आता है बार बार ।

Comments

rajnish said…
why u forgot ur specs, antena.
whenever u remember those things i sure u always remember me.
cheers
keepit up
bye
आईना said…
Rajnish mujhe pata hai tum hamesha meri kami ko hi to dikhaoge but thanks yaar for your funny comment which give me a smile on my face.
Wanted said…
Hi Blogger !
Accept my heartiest greets for your Blog.
-Gunjan

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मनुष्य एक सामाजिक नहीं सामूहिक प्राणी है!

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी नहीं बल्कि मनुष्य एक सामूहिक प्राणी है। पहले जाति विशेष का समूह, फिर धर्म विशेष, फिर गाँव विशेष, शहर विशेष, क्षेत्र विशेष, राज्य विशेष, भाषा विशेष, देश विशेष, विचारधारा विशेष- सुविधानुसार हम सब अपने-अपने समूह में शामिल रहते हैं। इतना ही नहीं ये सामूहिक विभेद का काम विद्यालय और महाविद्यालय स्तर पर भी चलता रहता है। बंटवारे का बीज तो हम सब बचपन से ही अपने मन में बोये रहते हैं। समय-समय पर कोई महापुरुष या स्त्री इसमें खाद पानी दे जाते हैं, और ये फलने फूलने लगते हैं। फेसबुक और व्हाट्सएप्प जैसे सोशल नेटवर्किंग प्लेटफार्म भी समूह बनाने की सहूलियतें दे रहा है। यहाँ भी लोग सामूहिक बँटवारे को बड़े प्यार से अपना रहे। अगर आपको सामूहिक बँटवारा पसंद नहीं तो भी लोग आपको बाँट कर ही रहेंगे। कोई आपको जातिगत समूह में शामिल करेगा तो कोई शहर, राज्य, पेशेगत समूह में शामिल करेगा, लेकिन बँटवारा ज़रूरी है।
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बुरा स्वप्न

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महिला दिवस और एक सशक्त महिला

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